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हिंदू युवा और थोपी गई शर्म: अपनी पहचान को छुपाना कब सीखा?

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🔥 हिन्दू युवा को शर्म किस बात की दिलाई गई? 🔥

A young man looking at his reflection in a cracked mirror, seeing his true identity as a confident Sanatani warrior behind the modern facade

नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी। आज यह लेख गुस्से का नहीं है। आज यह लेख शर्म का है। उस चुप, धीमी, जहरीली शर्म का, जो तुम्हें बिना चोट लगाए अंदर से छोटा बना देती है।

सोचो। तुम्हें किस बात पर शर्म आनी सिखाई गई। अपने तिलक पर। अपने मंदिर जाने पर। संस्कृत शब्द बोलने पर। त्योहार मनाने पर। माता-पिता के संस्कारों पर।

तुम्हें सिखाया गया कि यह सब private रखो। सबके सामने मत दिखाओ। लोग judge करेंगे। और धीरे-धीरे तुमने खुद को छुपाना सीख लिया।

शर्म हमेशा डांट से नहीं आती। शर्म अक्सर हँसी, मज़ाक और silence से आती है। जब कोई कहे कि अरे तू तो बहुत धार्मिक है और यह तारीफ नहीं, एक व्यंग्य हो। जब कोई कहे कि तू तो मंदिर-टाइप इंसान है और तुम्हें लगे कि अब तुम्हें सफाई देनी पड़ेगी। यही शर्म है।

यह शर्म अचानक नहीं आई। इसे सिस्टम ने पॉलिश किया। इतिहास को ऐसा पढ़ाया गया कि गौरव गायब हो गया। मीडिया ने ऐसा दिखाया कि पहचान बोझ बन गई। और सोशल स्पेस ने ऐसा हँसाया कि तुम खुद पर ही हँसने लगे।

पर ज़रा ठहरो। अगर तुम्हारी संस्कृति सच में शर्म की चीज़ होती, तो उसे मिटाने के लिए इतनी मेहनत क्यों लगती। अगर तुम्हारी पहचान इतनी ही कमज़ोर होती, तो उसे hide कराने की इतनी ज़रूरत क्यों पड़ती।

शर्म का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि यह तुम्हें लड़ने भी नहीं देती। यह तुम्हें सवाल भी नहीं करने देती। यह बस कहती है कि चुप रहो, नज़र मत आओ।

लेकिन सनातन धर्म शर्म का धर्म नहीं है। यह स्वाभिमान का धर्म है। अगर स्वाभिमान अधर्म होता, तो युद्धभूमि में भगवद्गीता कभी यह न कहती कि अपने स्वधर्म से मत भागो।

आज हिन्दू युवा या तो शर्म से चुप है, या फिर शर्म को ढकने के लिए ज़रूरत से ज़्यादा loud है। दोनों ही हालतों में वह खुद से दूर है।

याद रखो। शर्म तुम्हारी नहीं है। शर्म डाली गई है। और जो डाली गई है, उसे उतारा भी जा सकता है।

अपने आप से एक सवाल पूछो। जिस चीज़ ने तुम्हें हजारों साल जिंदा, जगा और जुड़ा रखा, उस पर शर्म कैसी।

तुम्हें घमंड नहीं सिखाया जा रहा। तुम्हें बस अपने आप से माफी माँगना बंद करने को कहा जा रहा है।

यह लेख उकसाने के लिए नहीं है। यह लेख आईने के सामने खड़ा करने के लिए है।

🕉️ मैं हिन्दू हूँ। और अब मैं अपनी पहचान पर शर्मिंदा नहीं हूँ।

लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद


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