शबरी और श्रीराम — जहाँ भक्ति ने हर सीमा तोड़ दी
रामचरितमानस में शबरी प्रसंग — भक्ति की पराकाष्ठा
रामचरितमानस का अरण्यकांड केवल वनवास की कथा नहीं है, वह भक्ति के उस शिखर का उद्घाटन है जहाँ ज्ञान, जाति, कुल और सामाजिक मर्यादाएँ स्वतः विलीन हो जाती हैं। इसी कांड में भगवान श्रीराम माता जानकी और लक्ष्मण के साथ उन ऋषि-मुनियों से मिलते हैं, जिनकी साधना ने वन को तीर्थ बना दिया था। इसी प्रवाह में माता शबरी का वह प्रसंग आता है, जो भारतीय चेतना में भक्ति की पराकाष्ठा और सामाजिक समरसता का अमर प्रतीक बन गया।
शबरी का जन्म भील समाज में हुआ, किंतु उनका चित्त बाल्यावस्था से ही वैराग्य और सात्त्विकता से भरा हुआ था। जब विवाह का समय आया, तब उन्होंने गृहस्थ जीवन को अस्वीकार कर दिया और महर्षि मतंग की शरण ग्रहण की। शिष्य और गुरु का यह संबंध किसी सामाजिक अनुबंध पर नहीं, बल्कि आत्मा की पुकार पर आधारित था। समय आने पर जब महर्षि मतंग देवलोक जाने लगे, तो शबरी उनके साथ चलने की जिद करने लगीं। गुरु का हाथ पकड़कर रोती हुई वह केवल इतना जानती थीं कि उनके जीवन का अर्थ अब गुरु और प्रभु की प्रतीक्षा है।
महर्षि मतंग त्रिकालदर्शी थे। उन्होंने शबरी को सांत्वना दी और कहा कि इसी आश्रम में एक दिन स्वयं भगवान पधारेंगे। उन्होंने भविष्य का विस्तार से वर्णन किया—राम का अवतरण, विवाह, वनवास और अंततः सीता-हरण के पश्चात इस वन में आगमन। उन्होंने यह भी कहा कि शबरी सुग्रीव से मित्रता का मार्ग दिखाएंगी और रावण-वध का पथ प्रशस्त होगा। गुरु के वचन शबरी के लिए शास्त्र बन गए।
गुरु के देवलोक गमन के बाद शबरी उसी आश्रम में रहीं। हर दिन वह मार्ग साफ करतीं, फूल बिछातीं, कंद-मूल-फल एकत्र करतीं और यही सोचतीं कि आज प्रभु आएँगे। समय बीतता गया, बालिका युवती बनी, युवती वृद्धा हो गई, पर प्रतीक्षा का भाव वैसा ही निष्कलुष रहा। और एक दिन, उन्हीं फूलों पर प्रभु के चरण पड़े।
भगवान श्रीराम को देखते ही शबरी भावविह्वल हो गईं। उन्होंने प्रभु के चरण धोए, उन्हें आसन दिया और प्रेमवश चख-चख कर कंद, मूल और फल अर्पित किए कि कहीं कड़वा न हो। जिन राम को राजमहलों में भी जूठा नहीं खिलाया गया था, उन्हीं राम ने शबरी का जूठा प्रेमपूर्वक स्वीकार किया। यह प्रसंग किसी सामाजिक विद्रोह का नहीं, बल्कि करुणा और भक्ति की सर्वोच्च स्वीकृति का प्रतीक है।
इसी प्रसंग में भगवान श्रीराम ने शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश दिया। उन्होंने कहा कि उनके लिए जाति, कुल, विद्या, बल या वैभव का कोई मूल्य नहीं—भक्ति ही एकमात्र संबंध है। संतों का संग, कथा-श्रवण, गुरु-सेवा, निष्कपट गुणगान, नाम-जप में विश्वास, इंद्रिय-संयम, समदृष्टि, संतोष और सरल स्वभाव—इनमें से एक भी यदि सच्चे भाव से हो, तो भक्त उन्हें अत्यंत प्रिय होता है।
शबरी के लिए ये उपदेश केवल शब्द नहीं थे—वे उनके जीवन का स्वाभाविक स्वरूप थे। इसलिए प्रभु ने कहा कि जो गति योगियों को भी दुर्लभ होती है, वही आज शबरी के लिए सुलभ हो गई है। प्रभु के चरणों में मन स्थिर कर शबरी ने योगाग्नि से देह त्याग की और उस परम पद को प्राप्त किया, जहाँ से लौटना नहीं होता।
श्रीराम और शबरी का यह प्रसंग केवल एक कथा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का आत्मघोष है। यह स्पष्ट करता है कि भक्ति किसी वर्ग या जाति की बपौती नहीं है। शबरी का जीवन और श्रीराम का आचरण सदा यह स्मरण कराता रहेगा कि ईश्वर को पाने का मार्ग केवल और केवल भक्ति है।
लेखक / Writer : माधवन
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
🙏 Support Us / Donate Us
हम सनातन ज्ञान, धर्म–संस्कृति और आध्यात्मिकता को सरल भाषा में लोगों तक पहुँचाने का प्रयास कर रहे हैं। यदि आपको हमारा कार्य उपयोगी लगता है, तो कृपया सेवा हेतु सहयोग करें। आपका प्रत्येक योगदान हमें और बेहतर कंटेंट बनाने की शक्ति देता है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें