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अमरकंटक और नर्मदा नदी : गोंडी दृष्टिकोण से जीवन की आदिम स्मृति | Sanatan Sanvad

अमरकंटक और नर्मदा नदी : गोंडी दृष्टिकोण से जीवन की आदिम स्मृति | Sanatan Sanvad

अमरकंटक और नर्मदा नदी : गोंडी दृष्टिकोण से जीवन की आदिम स्मृति

Amarkantak and Narmada River

भारत की आत्मा को यदि केवल शास्त्रों की पंक्तियों में खोजा जाए तो वह अधूरी मिलती है। वह कहीं और भी स्पंदित होती है—वनों की छाया में, पहाड़ों की निस्तब्धता में, नदियों की धारा में, और उन समुदायों की स्मृतियों में जिन्होंने कागज़ पर नहीं, बल्कि हृदय पर इतिहास लिखा। गोंडी संस्कृति ऐसी ही एक जीवित परंपरा है—मौन, किंतु अत्यंत प्राचीन; अनलिखी, किंतु गहरी; प्रकृति के साथ एकाकार। और इस परंपरा की स्मृति में अमरकंटक केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि जीवन का आदि-बिंदु है।

अमरकंटक, जहाँ विंध्य और सतपुड़ा की पर्वत-रेखाएँ मिलती हैं, वहाँ से नर्मदा की धारा फूटती है। भूगोल इसे एक नदी का उद्गम कहता है, तीर्थयात्री इसे पवित्र स्नान-स्थल मानते हैं, पर गोंडी दृष्टि इससे भी आगे जाती है। उनके लिए यह वह स्थान है जहाँ जीवन ने पहली साँस ली, जहाँ पृथ्वी और जल का मिलन हुआ, जहाँ अस्तित्व ने स्वयं को पहचानना शुरू किया। उनकी लोककथाएँ कहती हैं—“जहाँ जल पहली बार पृथ्वी की देह से निकला, वहीं से मानव की यात्रा प्रारंभ हुई।” यह वाक्य कोई वैज्ञानिक दावा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक स्मृति है।

गोंडी समाज नर्मदा को देवी के रूप में नहीं, बल्कि जीवन-तत्व के रूप में देखता है। उनके दर्शन में “नर” और “मादा” का संतुलन ही सृष्टि की निरंतरता है। हर बीज, हर जन्म और हर वृक्ष इस द्वैत के संतुलन का साक्ष्य है। नर्मदा इसी संतुलन का प्रवाहमान प्रतीक है—जो रुकता नहीं, थमता नहीं, निरंतर बहता है। इसीलिए गोंडी लोकगीतों में नर्मदा को केवल माँ नहीं, जीवन की धारा कहा गया है।

आधुनिक विज्ञान भी नर्मदा घाटी को अत्यंत प्राचीन मानता है। यहाँ से प्राप्त पुरातात्त्विक अवशेष, जीवाश्म और उपकरण मानव की प्रारंभिक बसावटों की ओर संकेत करते हैं। यह तथ्य गोंडी कथाओं को सिद्ध करने का प्रयास नहीं, बल्कि यह दर्शाता है कि मौखिक परंपराएँ और वैज्ञानिक खोजें कभी-कभी समान दिशा में चलती हैं।

गोंडी संस्कृति का इतिहास शिलालेखों में नहीं, बल्कि सामूहिक स्मृति में सुरक्षित है। उनके लिए जंगल ग्रंथ है, नदी श्लोक है, और पर्वत मंत्र है। अमरकंटक उनके लिए तीर्थ नहीं, जन्म-स्मृति है—जहाँ प्रकृति और मनुष्य का सह-अस्तित्व दिखाई देता है। नर्मदा उन्हें सिखाती है कि जीवन बहना है, संतुलन रखना है, और अंततः प्रकृति में लौट जाना है।

यहाँ प्रश्न प्रमाण का नहीं, दृष्टिकोण का है। क्या हर सत्य केवल लिखित इतिहास से ही मान्य होता है? भारत की अनेक परंपराएँ स्मृति और श्रुति से ही जीवित रहीं। गोंडी कथाएँ उनके अस्तित्व की जड़ हैं—उन्हें केवल लोककथा कहकर नकार देना, एक प्राचीन सांस्कृतिक धारा को अनसुना करना होगा।

अमरकंटक और नर्मदा का संबंध भौगोलिक से अधिक दार्शनिक है। भारत की सभ्यता अनेक धाराओं से बनी है—वैदिक, लोक, आगमिक और आदिवासी। जैसे नर्मदा अनेक धाराओं को समेटकर आगे बढ़ती है, वैसे ही भारत का इतिहास भी अनेक स्मृतियों का संगम है। गोंडी संस्कृति इस इतिहास की एक प्राचीन, किंतु अनसुनी आवाज़ है।

आज जब पर्यावरण और संतुलन की चर्चा वैश्विक हो रही है, गोंडी दृष्टिकोण अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है। अमरकंटक से बहती नर्मदा केवल जल नहीं, बल्कि यह संदेश भी बहाती है कि प्रकृति के साथ चलकर ही जीवन संभव है।

अंततः, अमरकंटक और नर्मदा गोंडी समाज के लिए भूगोल नहीं, स्मृति हैं; नदी नहीं, जीवन-दर्शन हैं; कथा नहीं, पहचान हैं। इन्हें सुनने से भारत का इतिहास और भी व्यापक, जीवंत और मानवीय दिखाई देता है—एक अनादि धारा की तरह।

🙏 जय श्री कृष्ण 🙏

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