शिव तांडव स्तोत्र का रहस्य
शिव तांडव स्तोत्र केवल एक स्तुति नहीं है, केवल शब्दों की रचना नहीं है, और न ही यह मात्र एक काव्यात्मक चमत्कार है। यह वह स्पंदन है, जिसमें सृष्टि की उत्पत्ति, उसका संचालन और उसका विलय—तीनों एक साथ नृत्य करते हैं। यह स्तोत्र शिव के उस रूप का उद्घाटन करता है जहाँ वे ध्यानस्थ योगी नहीं, बल्कि सृष्टि के नर्तक हैं; जहाँ मौन शब्द बन जाता है और शब्द अग्नि में परिवर्तित हो जाता है। शिव तांडव स्तोत्र का रहस्य समझने के लिए पहले यह समझना आवश्यक है कि शिव कौन हैं—और तांडव क्या है।
शिव को सनातन परंपरा में केवल संहारक नहीं कहा गया। वे संहार के माध्यम से नवसृजन का द्वार खोलते हैं। वे समय हैं, वे काल हैं, और वे कालातीत भी हैं। जब शिव तांडव करते हैं, तो वह क्रोध का नृत्य नहीं होता, बल्कि संतुलन का नृत्य होता है। तांडव वह लय है, जिसमें ब्रह्मांड का प्रत्येक कण थिरकता है। इसी तांडव की अनुभूति शब्दों में ढलकर शिव तांडव स्तोत्र बनी।
इस स्तोत्र की रचना का श्रेय रावण को दिया जाता है। रावण केवल एक अहंकारी राजा नहीं, बल्कि महान शिवभक्त और तपस्वी था। कैलाश पर्वत को उठाने के प्रयास में जब शिव ने अंगूठे से पर्वत को दबाया, तब पीड़ा में डूबे रावण के भीतर से जो स्तुति प्रकट हुई, वही शिव तांडव स्तोत्र बनी। यह भय से नहीं, अनुभूति से निकली वाणी थी।
शिव तांडव स्तोत्र का पहला रहस्य इसकी ध्वनि और लय में छिपा है। यह केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि साधक के भीतर घटित होता है। इसके शब्द चेतना को झकझोरते हैं और मन के जड़त्व को तोड़ते हैं। जब इसे भावपूर्वक जपा जाता है, तो साधक स्वयं उस तांडव का हिस्सा बन जाता है।
इस स्तोत्र में शिव की जटाओं में बहती गंगा का वर्णन चेतना और ऊर्जा के संतुलन का प्रतीक है। शक्ति तभी कल्याणकारी होती है, जब उसे शिवत्व का आधार मिले। डमरू की ध्वनि नादब्रह्म का संकेत देती है—वह मूल कंपन, जिससे सृष्टि प्रकट हुई।
नटराज रूप में शिव अज्ञान को दबाकर मोक्ष का मार्ग दिखाते हैं। यह संदेश केवल मूर्ति तक सीमित नहीं, बल्कि स्तोत्र की प्रत्येक पंक्ति में प्रवाहित है। शिव तांडव स्तोत्र अहंकार को भस्म कर भक्ति और समर्पण का मार्ग प्रशस्त करता है।
यह स्तोत्र केवल धार्मिक पाठ नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक साधना है। यह भय को भस्म करता है, साहस जगाता है और जीवन के हर परिवर्तन को स्वीकार करना सिखाता है। आधुनिक विज्ञान भी अब स्वीकार करता है कि सृष्टि कंपन पर आधारित है—यही तांडव है।
अंततः शिव तांडव स्तोत्र का सबसे गहरा रहस्य यही है कि यह बाहर के शिव को नहीं, भीतर के शिव को जगाने का आह्वान है। जब साधक उस नृत्य का साक्षी बन जाता है, तब वह शिव के समीप नहीं, शिव के भीतर हो जाता है। यही कारण है कि यह स्तोत्र कालातीत है और हर युग में उतना ही प्रासंगिक है।
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