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👉 Click Hereराजा परीक्षित की मृत्यु और भागवत कथा की दिव्य शुरुआत
महाभारत के पश्चात जब पाण्डवों ने राज्य त्याग दिया, तब हस्तिनापुर का भार उनके पौत्र राजा परीक्षित को सौंपा गया। परीक्षित केवल एक राजा ही नहीं थे, बल्कि धर्म की रक्षा करने वाले शासक थे। उनके शासनकाल में अभी भी द्वापर युग की मर्यादाओं की छाया बनी हुई थी। वे न्यायप्रिय, सत्यनिष्ठ और प्रजा के हित में कार्य करने वाले राजा थे। किंतु समय का प्रभाव धीरे-धीरे बदल रहा था और कलियुग अपने पाँव पसारने लगा था।
एक दिन राजा परीक्षित वन में शिकार के लिए गए। लंबे समय तक भटकने के कारण वे अत्यंत प्यासे और थके हुए थे। उन्हें एक आश्रम दिखाई दिया जहाँ महर्षि शमीक गहन ध्यान में लीन थे। राजा ने उनसे जल की याचना की, परंतु ध्यानावस्था में होने के कारण ऋषि ने कोई उत्तर नहीं दिया। उस समय राजा के मन में क्षणिक क्रोध उत्पन्न हुआ। उन्होंने पास पड़ी एक मृत सर्प की देह उठाकर ऋषि के गले में डाल दी और वहाँ से चले गए। यह कार्य एक महान और धर्मनिष्ठ राजा के लिए उचित नहीं था, किंतु यह भी कलियुग के सूक्ष्म प्रभाव का संकेत था।
जब ऋषि शमीक के पुत्र श्रृंगी को इस घटना का समाचार मिला तो वह क्रोधित हो उठा। उसने तप के प्रभाव से राजा परीक्षित को शाप दे दिया कि सातवें दिन तक्षक नामक सर्प के डसने से उनकी मृत्यु हो जाएगी। जब महर्षि शमीक को यह ज्ञात हुआ तो उन्हें अत्यंत दुःख हुआ। उन्होंने अपने पुत्र को समझाया कि राजा ने भूल अवश्य की, परंतु वे धर्मात्मा हैं और उन्हें इतना कठोर शाप नहीं देना चाहिए था। फिर भी शाप वापस नहीं लिया जा सका।
राजा परीक्षित को जब शाप के विषय में ज्ञात हुआ तो उन्होंने इसे ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार कर लिया। उन्होंने राज्य अपने पुत्र जनमेजय को सौंप दिया और गंगा तट पर जाकर मृत्यु की प्रतीक्षा करने लगे। अब उनके मन में एक ही जिज्ञासा थी — मृत्यु से पूर्व क्या करना चाहिए? मनुष्य का परम कर्तव्य क्या है? जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है?
उनके इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए अनेक ऋषि और मुनि वहाँ एकत्र हुए। उसी समय महान तपस्वी और ज्ञानी शुकदेव जी वहाँ पहुँचे। वे वेदव्यास के पुत्र थे और अत्यंत उच्च कोटि के आत्मज्ञानी माने जाते थे। राजा परीक्षित ने उनसे विनम्र होकर पूछा कि मृत्यु समीप होने पर मनुष्य को क्या करना चाहिए, किसका स्मरण करना चाहिए और किस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।
भागवत कथा में सृष्टि की उत्पत्ति, विभिन्न अवतारों का वर्णन, भक्तों की महिमा और भक्ति मार्ग की श्रेष्ठता का विस्तार से वर्णन किया गया। शुकदेव जी ने बताया कि कलियुग में भगवान का नाम ही सबसे बड़ा आश्रय है। भक्ति, श्रद्धा और नामस्मरण से मनुष्य जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो सकता है।
सातवें दिन तक्षक नाग ने आकर अपने शाप के अनुसार राजा परीक्षित को डस लिया। किंतु उस समय तक राजा का मन पूर्णतः भगवान में स्थित हो चुका था। उन्होंने निर्भय होकर अपने प्राण त्याग दिए और परम धाम को प्राप्त हुए। उनकी मृत्यु भय या दुःख का कारण नहीं बनी, बल्कि भक्ति और ज्ञान की विजय का प्रतीक बन गई।
राजा परीक्षित की कथा हमें यह सिखाती है कि जीवन में भूल हो सकती है, परंतु अंतिम समय में यदि मनुष्य ईश्वर का स्मरण करे और सत्य को स्वीकार करे, तो वह मोक्ष का मार्ग प्राप्त कर सकता है। यह भी शिक्षा मिलती है कि मृत्यु से भयभीत होने के बजाय उसे आत्मचिंतन और आध्यात्मिक उन्नति का अवसर मानना चाहिए।
भागवत कथा की शुरुआत इसी प्रसंग से हुई और यह ग्रंथ आज भी भक्ति और ज्ञान का महान स्रोत माना जाता है। कलियुग में जहाँ अधर्म और भ्रम बढ़ते हैं, वहीं भगवान की कथा और नामस्मरण ही मनुष्य को शांति और मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं।
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