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👉 Click Hereरायगढ़ पर छत्रपति शिवाजी महाराज के समय मनाया जाने वाला होली (शिमगा) उत्सव 🚩
छत्रपति शिवाजी महाराज के शासनकाल में होली, जिसे महाराष्ट्र में शिमगा भी कहा जाता है, केवल एक धार्मिक पर्व नहीं था बल्कि यह वीरता, संस्कृति और सामाजिक एकता का प्रतीक उत्सव माना जाता था। रायगढ़ किले पर यह पर्व अत्यंत उत्साह, अनुशासन और गरिमा के साथ मनाया जाता था। स्वराज्य के इस पावन स्थल पर होली का उत्सव सैनिकों और प्रजा दोनों के लिए आनंद और प्रेरणा का अवसर बनता था।
ऐतिहासिक उल्लेखों से ज्ञात होता है कि सन् 1671 में होली के दिन महाराज स्वयं होली के मैदान में उपस्थित रहे थे। उस अवसर पर मर्दानी खेलों का आयोजन किया गया था, जिनमें दांडपट्टा, कुश्ती और शौर्य प्रदर्शन जैसे कार्यक्रम हुए। हलगी और रणवाद्यों की गूंज के बीच यह उत्सव वीरता और उल्लास का अद्भुत संगम बन जाता था। यह केवल मनोरंजन नहीं बल्कि सैनिकों के पराक्रम और युद्धकौशल को प्रोत्साहित करने का माध्यम भी था।
रायगढ़ पर शंकर मंदिर के समीप और बाजार क्षेत्र के पास एक विशेष खुला स्थान था, जिसे “होली का मैदान” कहा जाता था। इसी स्थान पर परंपरानुसार होली जलाई जाती थी। यह स्थान केवल धार्मिक अनुष्ठान के लिए नहीं बल्कि सामूहिक आयोजन का केंद्र भी था, जहाँ सैनिक, सरदार और सामान्य प्रजा एक साथ उपस्थित होते थे।
होली के अवसर पर सैनिकों के लिए विशेष प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती थीं। कुश्ती के अखाड़े सजते थे, तलवारबाजी और दांडपट्टा जैसे युद्धकौशल का प्रदर्शन किया जाता था। इन आयोजनों का उद्देश्य सैनिकों के मन में साहस, आत्मविश्वास और युद्ध के प्रति तत्परता बनाए रखना था। इस प्रकार होली का पर्व स्वराज्य की सैन्य परंपरा से भी जुड़ा हुआ था।
इस उत्सव की एक विशेष परंपरा नारियल से जुड़ी थी। होली जलने के बाद उसमें नारियल डाला जाता था और महाराज की ओर से चुनौती दी जाती थी कि जो वीर उस जलती अग्नि से नारियल निकालकर लाएगा, उसे सम्मानित किया जाएगा। कहा जाता है कि इस साहसिक कार्य को सफलतापूर्वक करने वाले वीर को स्वर्ण कंगन जैसे मूल्यवान पुरस्कार प्रदान किए जाते थे।
रायगढ़ पर मनाया जाने वाला होली उत्सव सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण था। यह पर्व स्वराज्य के सैनिकों और सामान्य जनता के बीच आत्मीय संबंध को मजबूत करता था। सभी लोग एक साथ मिलकर इस उत्सव में भाग लेते थे, जिससे स्वराज्य की एकता और सामूहिक भावना सुदृढ़ होती थी। यह परंपरा आगे चलकर पेशवा काल के अंतिम समय तक भी जारी रही।
इस प्रकार छत्रपति शिवाजी महाराज ने होली जैसे पारंपरिक पर्व को केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे शौर्य, संस्कृति और सामाजिक समरसता से जोड़ दिया। उनके समय में होली का उत्सव स्वराज्य की जीवंत परंपरा का प्रतीक था, जिसमें आनंद के साथ-साथ पराक्रम और राष्ट्रभावना का भी समावेश दिखाई देता था।
जय शिवराय 🚩
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