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भौतिक शक्ति और प्रभु भक्ति – मन जहाँ लगा, जीवन वहीं बंध गया

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भौतिक शक्ति और प्रभु भक्ति – मन जहाँ लगा, जीवन वहीं बंध गया

भौतिक शक्ति और प्रभु भक्ति – मन जहाँ लगा, जीवन वहीं बंध गया

एक निर्धन ब्राह्मण हाथ में रामायण की पुस्तक लेकर गाँव-गाँव घूमता रहता था। उसका जीवन बहुत कठिन था। वह यही आशा करता कि कहीं कोई व्यक्ति मिल जाए जो रामायण सुन ले और बदले में उसे थोड़ी-सी दक्षिणा मिल जाए, जिससे उसका गुजारा चल सके। कई बार दिन भर भटकने के बाद भी उसे न भोजन मिलता और न पानी। न उसका अपना घर था, न कोई अपना सहारा। वह अकेला ही जीवन की कठिनाइयों से जूझ रहा था।

एक दिन भटकते-भटकते वह जंगल की ओर निकल गया। भूख और थकान से व्याकुल होकर उसके मन में निराशा भर गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि जीवन को आगे बढ़ाए या सब कुछ समाप्त कर दे। इसी असमंजस में चलते हुए अचानक उसकी दृष्टि एक संत पर पड़ी जो कमंडल लेकर उसकी ओर आ रहे थे।

ब्राह्मण तुरंत उनके चरणों में झुक गया और विनम्रता से बोला कि वह उनकी क्या सेवा कर सकता है। संत ने उसकी दशा देखकर कहा कि यदि वह प्रतिदिन उन्हें रामायण सुनाए तो बदले में वे उसके भोजन की व्यवस्था कर देंगे। पास ही नदी का किनारा था, इसलिए संत ने सुझाव दिया कि वहीं एक छोटी-सी कुटिया बना ली जाए, जहाँ वह रोज रामायण का पाठ करे और संत भिक्षा लाकर दोनों का जीवन चलाएँ।

ब्राह्मण ने तुरंत यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया, क्योंकि उसके लिए सबसे बड़ा प्रश्न भोजन का था। दोनों नदी किनारे पहुँचे और एक छोटी-सी कुटिया बना ली। सुबह-शाम नदी में स्नान करते, ब्राह्मण रामायण का पाठ करता और संत नगर से भिक्षा लाकर दोनों मिलकर भोजन कर लेते। इसी प्रकार उनका जीवन शांतिपूर्वक चलने लगा।

एक वर्ष बीत गया। संत ब्राह्मण की सेवा और रामायण पाठ से बहुत प्रसन्न हुए। एक दिन उन्होंने कहा कि वे उसे वरदान देना चाहते हैं और वह जो चाहे माँग सकता है। यह सुनकर ब्राह्मण बहुत प्रसन्न हुआ। उसने कहा कि उसे धन की आवश्यकता है, यदि धन मिल जाए तो उसका जीवन सुधर जाएगा। संत ने झोपड़ी का एक तिनका उठाया और उसे हाथ में तोड़ा। देखते ही देखते वहाँ स्वर्ण मुद्राओं का ढेर लग गया।

संत ने फिर कहा कि यदि और कुछ चाहिए तो अभी माँग ले। ब्राह्मण ने कहा कि धन तो मिल गया, पर रहने के लिए घर नहीं है। संत ने “तथास्तु” कहा और उसी क्षण जंगल में एक विशाल सात मंजिला भवन खड़ा हो गया। ब्राह्मण की इच्छाएँ बढ़ती जा रही थीं। उसने कहा कि यदि एक अच्छी पत्नी मिल जाए तो घर व्यवस्थित हो जाएगा। संत ने उसे संकेत किया और शीघ्र ही उसका विवाह एक सुशील युवती से हो गया। कुछ समय बाद उसके घर पुत्र का जन्म हुआ।

अब उसके पास धन, मकान, पत्नी और पुत्र सब कुछ था। एक दिन संत ने फिर पूछा कि अब कोई इच्छा शेष है क्या। तब ब्राह्मण ने कहा कि अब वह भगवान का साक्षात्कार करना चाहता है। संत ने गंभीर स्वर में कहा कि भगवान का साक्षात्कार उसे नहीं मिल सकता। उन्होंने समझाया कि उसका मन धन, घर, पत्नी और पुत्र में ही उलझा हुआ है। जब तक मन संसार की वस्तुओं में बंधा रहेगा, तब तक भगवान की अनुभूति संभव नहीं है।

इस कथा की शिक्षा यही है कि भौतिक साधन जीवन को सुविधाजनक बना सकते हैं, लेकिन आत्मिक शांति केवल ईश्वर भक्ति से ही मिलती है। जब मन संसार की इच्छाओं से मुक्त होता है तभी प्रभु का मार्ग खुलता है। भौतिक शक्ति जीवन को समृद्ध बना सकती है, लेकिन प्रभु भक्ति ही जीवन को पूर्ण बनाती है।

इतना कहकर संत वहाँ से चले गए और ब्राह्मण संसार के सुखों में उलझा रह गया। उसे जीवन भर संत के शब्द याद आते रहे कि जिसका मन भौतिक वस्तुओं में फँसा रहता है, उसका मन सच्ची भक्ति में स्थिर नहीं हो सकता।

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