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👉 Click Hereसमान वितरण की सच्ची बुद्धि – न्याय और विवेक की प्रेरक कथा
एक बार मिथिला के राजा के दरबार में एक संत पधारे। राजा ने बड़े सम्मान और श्रद्धा के साथ उनका स्वागत किया और आशीर्वाद प्राप्त किया। संत ने बताया कि वे चारों धाम की यात्रा करके लौटे हैं और अपने यजमानों में प्रसाद बाँटते हुए यहाँ आए हैं। उन्होंने कहा कि वे राजा और दरबारियों को भी प्रसाद देना चाहते हैं, और प्रसाद वितरण के बाद ही आगे प्रस्थान करेंगे।
संत ने अपनी झोली से चार बताशे निकालकर राजा को दिए और कहा कि ये चारों धाम का प्रसाद हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इन चार बताशों को दरबार में उपस्थित सभी लोगों के बीच समान रूप से बाँटना होगा, और सबसे पहले प्रसाद राजा स्वयं ग्रहण करेंगे।
राजा अपनी हथेली पर रखे चार बताशों को देखते रहे और सोच में पड़ गए कि इतने कम प्रसाद को इतने अधिक लोगों में समान रूप से कैसे बाँटा जा सकता है। उन्होंने दरबार के एक बुजुर्ग दरबारी को बुलाकर यह कार्य सौंपा, यह सोचकर कि शायद अनुभव के कारण वह कोई उपाय निकाल लें। वृद्ध दरबारी ने बहुत विचार किया, लेकिन कोई समाधान समझ में नहीं आया।
दरबार में बैठा एक नाई, जो पंडितजी से मन ही मन ईर्ष्या रखता था, तुरंत उठकर बोला कि इस समस्या का समाधान केवल पंडितजी ही कर सकते हैं। राजा ने पंडितजी की ओर देखा तो पंडितजी मुस्कुराते हुए उठ खड़े हुए और विनम्रता से बोले कि वे प्रसाद का समान वितरण अवश्य करेंगे।
पंडितजी ने आदरपूर्वक बताशे ग्रहण किए और राजा से निवेदन किया कि दरबार में एक बड़ा घड़ा पानी, उपस्थित लोगों की संख्या के बराबर कुल्हड़, थोड़ी चीनी और गुलाब जल मँगवाया जाए। राजा ने तुरंत व्यवस्था करने का आदेश दिया। पंडितजी ने घड़े में भरे पानी में चीनी डाल दी और फिर उसमें गुलाब जल मिला दिया।
यह देखकर संत बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि जिस राज्य में ऐसे बुद्धिमान और न्यायप्रिय लोग होते हैं, वहाँ सदैव समृद्धि और कल्याण बना रहता है। इस प्रसंग से यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची बुद्धि वही है जो असंभव लगने वाली समस्या का भी न्यायपूर्ण समाधान खोज ले। सीमित साधनों में भी समानता स्थापित करना ही वास्तविक विवेक है।
जीवन में कई बार परिस्थितियाँ कठिन होती हैं, लेकिन धैर्य और बुद्धि से हर समस्या का समाधान निकाला जा सकता है। सच्चाई यही है कि बुद्धिमत्ता और न्यायप्रियता की सदैव विजय होती है, जबकि ईर्ष्या अंततः पछतावे का कारण बनती है।
सनातन संवाद
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