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👉 Click Hereअहंकार — “मैं” का भ्रम और उसका अंत
14 Apr 2026 | 10:00
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं तुम्हें उस अदृश्य शत्रु के बारे में बताने आया हूँ
जो बाहर नहीं,
भीतर बैठा है — अहंकार।
अहंकार का अर्थ
केवल घमंड नहीं है।
अहंकार का असली अर्थ है —
“मैं” की गलत पहचान।
जब तुम कहते हो —
“मैं शरीर हूँ”,
“मैं मन हूँ”,
“मैं पद हूँ”,
“मैं धन हूँ” —
यहीं से अहंकार शुरू होता है।
सनातन धर्म कहता है —
तुम ये सब हो नहीं,
तुम इन सबका अनुभव करने वाले हो।
पर जब अनुभव करने वाला
खुद को अनुभव मान लेता है,
तो भ्रम पैदा होता है।
अहंकार यही भ्रम है।
अहंकार हमेशा तुलना करता है —
मैं बड़ा,
मैं छोटा,
मैं सही,
तुम गलत।
और जहाँ तुलना है,
वहाँ शांति नहीं हो सकती।
अहंकार को सबसे ज्यादा डर
टूटने से नहीं,
देखे जाने से होता है।
जैसे ही तुम उसे पहचान लेते हो,
वह कमजोर पड़ने लगता है।
इसीलिए सनातन में
ज्ञान, ध्यान और सेवा
तीनों का उद्देश्य एक है —
अहंकार को हल्का करना।
ज्ञान कहता है —
“तुम सीमित नहीं हो।”
ध्यान कहता है —
“तुम साक्षी हो।”
सेवा कहती है —
“तुम अकेले नहीं हो।”
अहंकार मिटाने की जरूरत नहीं,
उसे समझने की जरूरत है।
जब समझ आ जाए
कि “मैं” एक भूमिका है,
असली पहचान नहीं —
तो जीवन बदल जाता है।
तब तुम कार्य करते हो,
पर उससे बंधते नहीं।
तुम सफलता पाते हो,
पर उससे फूलते नहीं।
तुम असफल होते हो,
पर उससे टूटते नहीं।
सनातन कहता है —
जिस दिन “मैं” हल्का हो गया,
उस दिन ईश्वर स्पष्ट हो जाता है।
✍🏻 लेखक: तु ना रिं
🌿 सनातन ज्ञान श्रृंखला — दिन 70
सनातन संवाद
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