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Hanuman ji aur Sanjivani Booti Katha | Lord Hanuman Lifting Mountain | सनातन संवाद

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Hanuman ji aur Sanjivani Booti Katha | Lord Hanuman Lifting Mountain | सनातन संवाद

हनुमान और संजीवनी: जब भक्ति ने पर्वत उठाकर जीवन लौटा दिया - Hanuman Sanjivani Katha


Hanuman ji carrying Dronagiri Mountain




नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं तुम्हें वह कथा सुनाने आया हूँ जहाँ समय थम गया, श्वास रुक गई, और एक भक्त ने पर्वत उठाकर जीवन लौटा दिया—यह कथा है हनुमान की, और उस क्षण की जब उन्होंने संजीवनी लाकर लक्ष्मण को पुनर्जीवित किया।

लंका का युद्ध अपने चरम पर था। रावण का पुत्र इंद्रजीत मायावी था—उसके अस्त्र अदृश्य और घातक। युद्ध के बीच उसने शक्तिबाण चलाया, जो सीधा लक्ष्मण के वक्ष में लगा। लक्ष्मण मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़े। राम का हृदय काँप उठा—भाई की श्वास मंद पड़ रही थी। सेना में शोक छा गया।

तब वैद्य सुषेण ने कहा—“केवल हिमालय के द्रोणगिरि पर्वत पर मिलने वाली संजीवनी बूटी ही लक्ष्मण को बचा सकती है, और वह भी रात्रि के पहले पहर में।” समय बहुत कम था। सबकी दृष्टि एक ही ओर गई—हनुमान।




हनुमान बिना विलंब आकाश में उठे। वे वेग से हिमालय पहुँचे, पर समस्या यह थी कि कौन-सी बूटी संजीवनी है—यह पहचानना कठिन था। समय बीत रहा था। तब उन्होंने निर्णय लिया—“जब पहचान नहीं पा रहा, तो पूरा पर्वत ही ले चलता हूँ।”

उन्होंने द्रोणगिरि पर्वत को उखाड़ लिया और आकाश में लेकर चल पड़े। लंका में सबने आश्चर्य से देखा—आकाश में उड़ता पर्वत, और उसके साथ उड़ती भक्ति। सुषेण ने उचित औषधि निकाली, और लक्ष्मण के नासिका में सुगंध पहुँचते ही उनकी श्वास लौट आई। राम के नेत्रों में आँसू आ गए—यह केवल औषधि का चमत्कार नहीं था, यह भक्ति का परिणाम था।




हनुमान ने पर्वत लौटाया, पर उस दिन उन्होंने संसार को यह सिखाया कि सच्चा सेवक वही है जो असंभव को भी संभव बना दे। उन्होंने न यह सोचा कि कार्य कठिन है, न यह कि समय कम है—उन्होंने केवल यह सोचा कि राम का कार्य है।

यह कथा हमें सिखाती है कि जब हम किसी महान उद्देश्य से जुड़ते हैं, तो हमारी सीमाएँ टूट जाती हैं। भक्ति हमें वह शक्ति देती है, जो तर्क से परे है।

हनुमान ने पर्वत नहीं उठाया—उन्होंने विश्वास उठाया। और जहाँ विश्वास होता है, वहाँ जीवन लौट आता है।

स्रोत / संदर्भ
यह कथा वाल्मीकि रामायण (युद्धकाण्ड—संजीवनी प्रसंग) तथा रामचरितमानस में वर्णित है।
लेखक : तु ना रिं 🔱

प्रकाशन : सनातन संवाद

Copyright Disclaimer : यह कथा सनातन धर्म के प्रमाणिक ग्रंथों पर आधारित है। बिना अनुमति पुनर्प्रकाशन वर्जित है।




Labels: सनातन संवाद, तु ना रिं, हनुमान, संजीवनी बूटी, रामायण, भक्ति की शक्ति
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