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👉 Click Hereनाद — जहाँ से सृष्टि की शुरुआत हुई
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं तुम्हें उस रहस्य की ओर ले चलता हूँ
जिससे ऋषियों ने “शब्द” नहीं,
नाद कहा —
वही कंपन, वही ध्वनि,
जिससे सृष्टि की शुरुआत मानी गई।
सनातन धर्म कहता है —
शुरुआत में कुछ भी स्थूल नहीं था।
न रूप, न रंग, न आकार।
सबसे पहले जो प्रकट हुआ,
वह था — कंपन।
और उसी कंपन का नाम है — नाद।
यही नाद
जब स्पष्ट हुआ,
तो बना — “ॐ”।
कोई अक्षर नहीं,
बल्कि वह ध्वनि
जिसमें समस्त सृष्टि का बीज है।
ऋषियों ने सुना —
यह नाद हर जगह है।
हवा में,
जल में,
तुम्हारी धड़कन में,
यहाँ तक कि मौन में भी।
इसीलिए कहा गया —
“नाद ब्रह्म”
अर्थात ध्वनि ही ब्रह्म है।
जब तुम ध्यान में बैठते हो
और धीरे-धीरे भीतर उतरते हो,
तो एक सूक्ष्म ध्वनि सुनाई देती है।
वह बाहर से नहीं आती,
वह भीतर से उठती है।
वही नाद है।
संगीत भी
इसी नाद का विस्तार है।
जब स्वर शुद्ध होता है,
तो मन शांत हो जाता है।
क्योंकि वह तुम्हें
तुम्हारे मूल से जोड़ देता है।
इसीलिए
मंत्रों का इतना महत्व है।
वे शब्द नहीं,
नाद के स्वरूप हैं।
सही उच्चारण,
सही लय —
और चेतना बदलने लगती है।
आज लोग
केवल सुनते हैं,
पर सुनते नहीं।
शोर बहुत है,
पर नाद कम है।
सनातन कहता है —
यदि सच में सुनना है,
तो भीतर उतरना होगा।
जहाँ कोई आवाज़ नहीं,
वहीं असली ध्वनि है।
और जब वह सुनाई देने लगे,
तो समझ लेना —
तुम अपने स्रोत के करीब पहुँच रहे हो।
क्योंकि
जहाँ नाद है,
वहीं से जीवन निकला है,
और वहीं लौटता है।
✍🏻 लेखक: तु ना रिं
🌿 सनातन ज्ञान श्रृंखला
सनातन संवाद
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