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👉 Click Hereवैदिक ज्ञान में “अतिरिक्त सोच” (Overthinking) का समाधान
मन बड़ा विचित्र है… वह एक ही क्षण में स्वर्ग भी रच देता है और उसी क्षण नरक भी। जब यह मन अपने स्वभाव में होता है, तब वह शांत सरोवर की तरह निर्मल रहता है, पर जब यह अपनी ही कल्पनाओं के जाल में उलझ जाता है, तब वही मन “अतिरिक्त सोच” — जिसे आज की भाषा में Overthinking कहा जाता है — का कारण बन जाता है। वैदिक ज्ञान इस स्थिति को कोई आधुनिक समस्या नहीं मानता, बल्कि इसे मन की पुरानी आदत बताता है… वही मन जो कभी अर्जुन के भीतर युद्ध से पहले कंपित हुआ था, वही मन जो ऋषियों को तप में भी भटकाता था, वही मन आज के मनुष्य को रातों की नींद से दूर कर देता है। अंतर केवल इतना है कि पहले इसे “चंचलता” कहा जाता था, आज इसे “Overthinking” कहा जाता है… पर समस्या वही है — मन का अपने ही विचारों में उलझ जाना।
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