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👉 Click Hereसमत्व — सुख-दुःख से परे स्थिर रहने की कला
22 Apr 2026 | 10:00
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं तुम्हें उस अवस्था का परिचय कराता हूँ
जिसे गीता ने योग का हृदय कहा — समत्व।
समत्व का अर्थ है —
सुख और दुःख में समान रहना।
पर इसका अर्थ यह नहीं कि तुम्हें कुछ महसूस ही न हो।
अर्थ यह है —
महसूस करो, पर बहो मत।
जीवन में सुख आएगा, दुःख आएगा, लाभ होगा, हानि होगी, सम्मान मिलेगा, अपमान भी मिलेगा।
यह सब प्रकृति का खेल है।
पर जो भीतर बैठा है, वह इनसे बड़ा है।
समत्व उसी का नाम है —
जब तुम इन उतार-चढ़ावों के बीच अडिग रहो।
कृष्ण ने अर्जुन से कहा —
“समत्वं योग उच्यते”
अर्थात संतुलन ही योग है।
जब मनुष्य सुख में उछलता है, तो वह उसी से बंध जाता है।
और जब दुःख आता है, तो टूट जाता है।
समत्व सिखाता है —
दोनों को एक दृष्टि से देखो।
सुख आया — यह भी बदल जाएगा।
दुःख आया — यह भी बदल जाएगा।
जब यह समझ गहरी हो जाती है, तो मन स्थिर हो जाता है।
समत्व का अर्थ भावनाओं को दबाना नहीं, उन्हें समझना और पार जाना है।
तुम मुस्कुरा सकते हो, रो भी सकते हो, पर भीतर एक स्थिरता बनी रहती है।
यही आंतरिक शक्ति है।
आज की दुनिया भावनाओं में बह रही है।
इसलिए निर्णय गलत हो रहे हैं, रिश्ते टूट रहे हैं, मन अशांत है।
सनातन कहता है —
समत्व सीखो।
क्योंकि जो संतुलित है, वही स्पष्ट देख सकता है।
और जो स्पष्ट देखता है, वही सही चलता है।
✍🏻 लेखक: तु ना रिं
🌿 सनातन ज्ञान श्रृंखला — दिन 78
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