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👉 Click Here🕉️ तुरीय अवस्था: चेतना का चौथा आयाम 🕉️
(Turiya: The Fourth Dimension of Consciousness)
जब ऋषियों ने मनुष्य के भीतर छिपे हुए सत्य को देखा, तब उन्होंने केवल बाहरी जगत का वर्णन नहीं किया, बल्कि उस गहराई में उतर गए जहाँ शब्द भी मौन हो जाते हैं… वहीं से जन्म हुआ “तुरीय अवस्था” का ज्ञान, जो माण्डूक्य उपनिषद में अत्यंत सूक्ष्म और गूढ़ रूप से वर्णित है… यह अवस्था न जाग्रत है, न स्वप्न है, न सुषुप्ति… बल्कि इन तीनों से परे वह चौथा आयाम है, जहाँ आत्मा स्वयं को पहचान लेती है… मनुष्य सामान्यतः तीन अवस्थाओं में जीता है—जाग्रत अवस्था, जहाँ वह इंद्रियों के माध्यम से संसार को अनुभव करता है; स्वप्न अवस्था, जहाँ वह अपने मन के संसार में विचरण करता है; और सुषुप्ति, जहाँ सब कुछ शून्य-सा प्रतीत होता है, परंतु अज्ञान का आवरण बना रहता है… किंतु तुरीय अवस्था इन तीनों की सीमाओं को तोड़ देती है, जैसे आकाश बादलों से अलग होकर स्वयं को प्रकट कर देता है… यह वह स्थिति है जहाँ न कोई द्वंद्व है, न कोई भय, न कोई इच्छा—केवल शुद्ध चेतना का प्रकाश है…
ऋषि कहते हैं कि तुरीय अवस्था को शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता, क्योंकि यह अनुभव है, विचार नहीं… यह वह स्थिति है जहाँ “मैं” और “तुम” का भेद समाप्त हो जाता है, जहाँ देखने वाला, देखने की प्रक्रिया और जो देखा जा रहा है—तीनों एक हो जाते हैं… यही कारण है कि इसे “अद्वैत” की चरम अनुभूति कहा गया है, जिसका गहन प्रतिपादन अद्वैत वेदांत में मिलता है… जब साधक ध्यान में इतना गहरा उतर जाता है कि उसके भीतर का चंचल मन शांत हो जाता है, तब वह इस अवस्था की झलक पाता है… यह कोई अचानक मिलने वाली वस्तु नहीं, बल्कि साधना, वैराग्य और आत्मनिरीक्षण का परिणाम है…
तुरीय अवस्था का अनुभव ऐसा है मानो एक व्यक्ति जिसने जीवनभर केवल तरंगों को देखा हो, अचानक यह जान ले कि वह स्वयं सागर है… जब तक हम केवल विचारों, इच्छाओं और भावनाओं के स्तर पर जीते हैं, तब तक हम अपने वास्तविक स्वरूप से अनभिज्ञ रहते हैं… परंतु जैसे ही साधक भीतर उतरता है, उसे यह बोध होता है कि वह शरीर नहीं है, मन नहीं है, बल्कि एक साक्षी है—जो सब कुछ देख रहा है, पर किसी से बंधा नहीं है… यही साक्षीभाव धीरे-धीरे तुरीय अवस्था का द्वार खोलता है…
ध्यान की गहराई में जब सांस भी सूक्ष्म हो जाती है, और विचारों की लहरें शांत हो जाती हैं, तब एक क्षण आता है जहाँ केवल मौन बचता है… यह मौन सामान्य मौन नहीं होता, यह जीवंत होता है, जागृत होता है… उसी में तुरीय अवस्था की झलक मिलती है… यही कारण है कि योगशास्त्र में ध्यान को इतना महत्व दिया गया है, और पतंजलि योगसूत्र में इसे “चित्त वृत्ति निरोध” कहा गया है—अर्थात जब मन की सभी वृत्तियाँ रुक जाती हैं, तब आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो जाती है…
तुरीय अवस्था का अनुभव करते समय व्यक्ति को ऐसा लगता है मानो समय रुक गया हो… न अतीत का बोझ रहता है, न भविष्य की चिंता… केवल वर्तमान का असीम विस्तार होता है… यह वह स्थिति है जहाँ आनंद बाहर से नहीं आता, बल्कि भीतर से फूटता है… इसे “आनंद” भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि आनंद भी एक अनुभव है, और तुरीय अवस्था उससे भी परे है… यह शांति है, परंतु यह मृत शांति नहीं—यह जीवंत, स्पंदित और पूर्ण शांति है…
जो साधक इस अवस्था को प्राप्त कर लेता है, उसका जीवन पूरी तरह बदल जाता है… वह संसार में रहता है, परंतु संसार उसे बाँध नहीं पाता… वह कार्य करता है, परंतु कर्म के बंधन में नहीं फँसता… यही कारण है कि भगवद गीता में श्रीकृष्ण ने “स्थितप्रज्ञ” की अवस्था का वर्णन किया है—जो सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय से परे होता है… यह स्थितप्रज्ञता तुरीय अवस्था की ही झलक है…
परंतु यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझनी होगी—तुरीय अवस्था कोई भागने का मार्ग नहीं है… यह संसार से दूर जाने की नहीं, बल्कि उसे सही दृष्टि से देखने की अवस्था है… जब व्यक्ति तुरीय में स्थित होता है, तब वह हर वस्तु में उसी चेतना को देखता है… वृक्ष में, नदी में, पशु में, मनुष्य में—हर जगह वही एक तत्व व्याप्त दिखाई देता है… यही “ब्रह्मज्ञान” है, जिसे जानकर सब कुछ जान लिया जाता है…
साधना के मार्ग पर चलते हुए प्रारंभ में यह अवस्था क्षणिक रूप से आती है—जैसे बिजली की चमक… परंतु अभ्यास और धैर्य से यह स्थायी हो सकती है… इसके लिए आवश्यक है—नियमित ध्यान, आत्मचिंतन, और सबसे महत्वपूर्ण—अहंकार का त्याग… क्योंकि जब तक “मैं” का भाव बना रहेगा, तब तक तुरीय का अनुभव पूर्ण रूप से संभव नहीं…
तुरीय अवस्था कोई कल्पना नहीं, बल्कि एक जीवंत सत्य है, जिसे हर मनुष्य अनुभव कर सकता है… यह किसी विशेष धर्म, जाति या समय से बंधी नहीं है… यह हर उस व्यक्ति के लिए उपलब्ध है जो अपने भीतर उतरने का साहस करता है… आज के इस व्यस्त और तनावपूर्ण जीवन में, जहाँ मनुष्य बाहरी उपलब्धियों में उलझा हुआ है, तुरीय अवस्था का ज्ञान उसे यह याद दिलाता है कि असली शांति और संतोष बाहर नहीं, बल्कि उसके अपने भीतर ही छिपा हुआ है…
जब साधक इस सत्य को जान लेता है, तब उसके लिए जीवन केवल जीने का माध्यम नहीं रह जाता, बल्कि एक उत्सव बन जाता है… वह हर क्षण को पूर्णता से जीता है, क्योंकि उसे पता होता है कि वह केवल एक शरीर नहीं, बल्कि अनंत चेतना का अंश है… यही तुरीय अवस्था का वास्तविक अनुभव है—जहाँ जीवन और मृत्यु, सुख और दुख, सब एक ही सत्य में विलीन हो जाते हैं… और वहाँ केवल एक ही ध्वनि रह जाती है—“ॐ”… जो नाद नहीं, बल्कि अस्तित्व का स्वयं का स्वर है…
और जब यह “ॐ” भीतर गूंजने लगता है, तब साधक समझ जाता है कि वह कभी बंधा हुआ था ही नहीं… वह हमेशा से मुक्त था… बस उसे अपने ही स्वरूप का स्मरण करना था… यही तुरीय अवस्था है—अंत नहीं, बल्कि वास्तविक आरंभ…॥
सनातन संवाद
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