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अनादि अनंत: सनातन
न आदि है जिसका, न अंत है कहीं,
जो कण-कण में व्याप्त, वही सत्य है यहीं।
हिमालय की तपस्या में, जो मौन खड़ा है,
गंगा की धार बन, जो युगों से बढ़ा है।
वो सनातन है...
जहाँ वेदों की ऋचाएं, ज्ञान का दीप जलाती हैं,
जहाँ उपनिषदों की वाणी, मुक्ति का मार्ग बताती है।
जहाँ राम का चरित्र, मर्यादा का प्रमाण है,
जहाँ कृष्ण का गीता-ज्ञान, जीवन का विज्ञान है।
वो सनातन है...
शंख की उस गूँज में, जो अधर्म को थर्रा दे,
भस्म की उस शक्ति में, जो काल को भी डरा दे।
गौ, गंगा और गायत्री, जिसकी पहचान निराली है,
अहिंसा जिसका धर्म है, पर शौर्य की तलवार पाली है।
वो सनातन है...
मिट गए मिटाने वाले, पर ये वृक्ष सदा हरा रहा,
विपदाओं के तूफ़ान में भी, अडिग और खरा रहा।
सत्य, अहिंसा, प्रेम ही, जिसका पावन मूल है,
बसुधैव कुटुंबकम कहना, इसकी संस्कृति का फूल है।
जय सनातन, जय भारत।
सनातन संवाद
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