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👉 Click Hereतुरीय अवस्था और चौथे आयाम की चेतना का रहस्य
सनातन ज्ञान में मानव चेतना को केवल जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति — इन तीन अवस्थाओं तक सीमित नहीं माना गया, बल्कि इनसे परे एक चौथी अवस्था का भी वर्णन मिलता है, जिसे “तुरीय” कहा गया है। यह कोई सामान्य अवस्था नहीं, बल्कि चेतना का वह स्तर है, जहाँ मनुष्य अपने सभी अनुभवों के पार चला जाता है और केवल शुद्ध अस्तित्व का अनुभव करता है।
जाग्रत अवस्था में हम बाहरी संसार को अनुभव करते हैं, स्वप्न में आंतरिक कल्पनाओं को, और सुषुप्ति में गहरी नींद की शांति को। लेकिन इन तीनों में एक समानता है — इनमें “अनुभव करने वाला” बना रहता है। तुरीय अवस्था में यह भेद भी समाप्त हो जाता है। यहाँ एक गहरा रहस्य छिपा है — क्या वास्तव में ऐसी कोई अवस्था है, जहाँ अनुभव करने वाला और अनुभव, दोनों ही विलीन हो जाते हैं?
सनातन दृष्टिकोण कहता है कि तुरीय वही अवस्था है, जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है। वहाँ न कोई देखने वाला होता है, न कोई देखा जाने वाला — केवल एक शुद्ध चेतना रह जाती है। यह वही अवस्था है, जिसे ऋषियों ने ब्रह्म का अनुभव कहा है। तुरीय अवस्था को समझना केवल शब्दों से संभव नहीं है, क्योंकि यह बुद्धि और तर्क के परे है। यह एक ऐसा अनुभव है, जो तब प्रकट होता है, जब मन पूरी तरह शांत हो जाता है और अहंकार का अस्तित्व समाप्त हो जाता है।
जब साधक ध्यान में गहराई तक जाता है, तो वह धीरे-धीरे अपने विचारों से अलग होने लगता है। वह देखता है कि उसके विचार आ रहे हैं और जा रहे हैं, लेकिन वह उनसे जुड़ा नहीं है। यह अवस्था उसे साक्षी बनने की दिशा में ले जाती है। जब यह साक्षी भाव और गहरा होता है, तो वह उस बिंदु तक पहुँचता है, जहाँ साक्षी भी लय होने लगता है। यही तुरीय का द्वार है — एक ऐसा क्षण, जहाँ सब कुछ शांत हो जाता है।
कुछ साधकों का अनुभव है कि इस अवस्था में उन्हें समय का कोई अनुभव नहीं होता, न ही स्थान का। यह एक ऐसा विस्तार होता है, जहाँ सब कुछ एक साथ उपस्थित होता, लेकिन फिर भी कुछ भी अलग नहीं होता। तुरीय अवस्था का एक और रहस्य यह है कि यह केवल ध्यान में ही नहीं, बल्कि जीवन में भी प्रकट हो सकती है। जब मनुष्य पूरी तरह जागरूक होकर वर्तमान में स्थित होता है, तब वह इस अवस्था की झलक पा सकता है।
यह अवस्था हमें यह सिखाता है कि हम केवल अनुभवों का संग्रह नहीं हैं, बल्कि हम उस चेतना का हिस्सा हैं, जो हर अनुभव के पीछे है। तुरीय का संबंध “चौथे आयाम” से भी जोड़ा गया है। यह कोई भौतिक आयाम नहीं, बल्कि चेतना का आयाम है, जहाँ समय और स्थान की सीमाएँ समाप्त हो जाती हैं। यह वह स्तर है, जहाँ सब कुछ एक साथ होता है, और जहाँ अलगाव का कोई अस्तित्व नहीं होता।
आधुनिक विज्ञान भी अब चेतना के इन गहरे स्तरों को समझने का प्रयास कर रहा है, लेकिन अभी यह केवल प्रारंभिक चरण में है। सनातन ज्ञान ने इन अवस्थाओं का अनुभव हजारों वर्षों पहले किया था और उन्हें शब्दों में व्यक्त करने का प्रयास किया था। तुरीय अवस्था का यह रहस्य हमें यह सिखाता है कि जीवन केवल बाहरी अनुभवों का नहीं, बल्कि आंतरिक जागरण का भी है। हम जितना बाहर देखते हैं, उतना ही भीतर भी देखने की आवश्यकता है।
यह हमें यह प्रेरणा देता है कि हम अपने जीवन में ध्यान और जागरूकता को स्थान दें, ताकि हम अपने वास्तविक स्वरूप को अनुभव कर सकें। अंततः, यह अवस्था हमें यह समझने में सहायता करती है कि हम कभी भी सीमित नहीं थे। हमारी सीमाएँ केवल हमारे मन की रचना हैं। जब ये सीमाएँ हट जाती हैं, तब हम उस अनंत चेतना को अनुभव करते हैं, जो हमेशा से हमारे भीतर थी।
इस प्रकार, तुरीय अवस्था का यह रहस्य केवल एक दार्शनिक विचार नहीं, बल्कि चेतना के अंतिम सत्य का अनुभव है — एक ऐसा अनुभव, जो हमें यह दिखाता है कि हम वास्तव में कौन हैं।
✍️ लेखक: डॉ. मनोहर शुक्ल – गुप्त और रहस्यमय कथाओं के विशेषज्ञ
सनातन संवाद
"धर्मो रक्षति रक्षितः"
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