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👉 Click Hereहिरण्यगर्भ का रहस्य: सृष्टि से पहले वह कौन-सा ‘स्वर्ण गर्भ’ था जिससे ब्रह्मांड के प्रकट होने की बात कही गई?
सनातन परंपरा के सबसे प्राचीन और रहस्यमय विचारों में एक नाम बार-बार सामने आता है—“हिरण्यगर्भ”। यह शब्द सुनते ही मन में किसी स्वर्णिम अंडे, दिव्य प्रकाश अथवा ब्रह्मांड के किसी रहस्यमय बीज की कल्पना बनने लगती है। लेकिन वैदिक साहित्य में हिरण्यगर्भ का विचार केवल किसी चमकते हुए अंडे की कहानी नहीं है। इसके पीछे सृष्टि की उत्पत्ति, अस्तित्व के प्रथम प्रकट सिद्धांत और उस परम सत्ता के विषय में अत्यंत गंभीर चिंतन छिपा हुआ है, जो दृश्य जगत के प्रकट होने से पहले भी विद्यमान थी।
ऋग्वेद के प्रसिद्ध हिरण्यगर्भ सूक्त का आरंभ ही एक असाधारण कथन से होता है—“हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे...”। सामान्य अर्थ में इसका भाव है कि आरंभ में हिरण्यगर्भ प्रकट हुआ; वही उत्पन्न जगत का स्वामी था। उसी ने पृथ्वी और द्युलोक को धारण किया। इसके बाद मंत्र बार-बार प्रश्न करता है—हम किस देवता को हवि अर्पित करें? यह प्रश्न साधारण धार्मिक प्रश्न नहीं है। इसके भीतर ऋषि मानो सृष्टि के पीछे उपस्थित उस एक मूल सत्ता की खोज कर रहे हैं, जिससे अलग-अलग देवशक्तियों और समस्त अस्तित्व की व्याख्या संभव हो सके।
“हिरण्य” का सामान्य अर्थ स्वर्ण है और “गर्भ” का अर्थ गर्भ, बीज, भीतर स्थित तत्व या वह स्थान जिसमें किसी वस्तु के प्रकट होने की संभावना छिपी हो। इस कारण हिरण्यगर्भ को “स्वर्णिम गर्भ” कहा जाता है। लेकिन यहाँ स्वर्ण को केवल धातु समझना उचित नहीं होगा। वैदिक प्रतीक-भाषा में तेज, प्रकाश, दिव्यता और प्रकट होने वाली चेतना को समझाने के लिए स्वर्णिमता का प्रयोग मिलता है। इस दृष्टि से हिरण्यगर्भ उस प्रथम प्रकाशमान सिद्धांत का संकेत बन जाता है, जिसमें आगे प्रकट होने वाली सृष्टि की संभावना निहित है।
सबसे रोचक प्रश्न यह है कि यदि पृथ्वी नहीं थी, सूर्य नहीं था, चंद्रमा नहीं था, मनुष्य नहीं था और वह ब्रह्मांड भी अपने वर्तमान रूप में नहीं था, तब हिरण्यगर्भ कहाँ था? यही प्रश्न इस अवधारणा को रहस्यमय बनाता है। हम किसी वस्तु को हमेशा स्थान के भीतर सोचते हैं। एक पर्वत पृथ्वी पर है, पृथ्वी अंतरिक्ष में है और ग्रह किसी आकाशगंगा में हैं। लेकिन यदि बात स्वयं सृष्टि के प्रारंभ की हो रही हो, तो उस प्रथम अवस्था को सामान्य “स्थान” में रखना कठिन हो जाता है। क्योंकि स्थान और समय भी उसी सृष्टि का हिस्सा हैं जिसकी उत्पत्ति पर विचार किया जा रहा है।
इसलिए हिरण्यगर्भ को किसी आकाश में तैरते हुए विशाल स्वर्ण अंडे के रूप में समझ लेना वैदिक विचार की गहराई को बहुत सीमित कर देता है। बाद के पुराणों और ब्रह्मांड-वर्णनों में ब्रह्मांडीय अंडे की कल्पना अधिक स्पष्ट रूप से विकसित होती है, लेकिन वैदिक हिरण्यगर्भ उससे भी अधिक सूक्ष्म दार्शनिक संकेत रखता है। हिरण्यगर्भ को समझने के लिए एक बीज की कल्पना की जा सकती है। किसी छोटे से बीज को देखकर विशाल वृक्ष दिखाई नहीं देता। उसमें शाखाएँ नहीं दिखाई देतीं, फल नहीं दिखाई देते, पक्षियों के घोंसले नहीं दिखाई देते और छाया भी दिखाई नहीं देती। फिर भी उचित परिस्थितियाँ मिलने पर वही सब उस बीज से प्रकट हो सकता है। बीज अपने भीतर आने वाले वृक्ष की संभावना रखता है। इसी प्रकार हिरण्यगर्भ को उस ब्रह्मांडीय संभावना के प्रतीक के रूप में देखा गया जिसमें नाम और रूप से युक्त जगत अभी स्पष्ट रूप से प्रकट नहीं हुआ था।
लेकिन हिरण्यगर्भ को केवल पदार्थ का बीज कहना भी पर्याप्त नहीं है। वैदिक और उपनिषदिक परंपराओं में सृष्टि को केवल जड़ पदार्थ की घटना के रूप में नहीं देखा जाता। चेतना का प्रश्न लगातार उपस्थित रहता है। इसीलिए बाद के वेदांत में हिरण्यगर्भ शब्द का प्रयोग समष्टि सूक्ष्म शरीर या विश्व-मन जैसी अवधारणाओं के संदर्भ में भी मिलता है। यहाँ रहस्य और गहरा हो जाता है। जिस प्रकार एक व्यक्ति के पास व्यक्तिगत मन है, उसी प्रकार क्या पूरी सृष्टि के पीछे भी किसी प्रकार का समष्टिगत मन या चेतना सिद्धांत माना गया? वेदांत की कुछ व्याख्याओं में हिरण्यगर्भ इसी दिशा में समझा जाता है। व्यक्तिगत स्तर पर हम सोचते हैं, अनुभव करते हैं, स्मरण करते हैं और इच्छा करते हैं। समष्टि के स्तर पर सभी सूक्ष्म शरीरों और प्राणों के सामूहिक सिद्धांत को हिरण्यगर्भ कहा जाता है। इसलिए अलग-अलग ग्रंथ और दार्शनिक परंपराएँ हिरण्यगर्भ को थोड़े अलग संदर्भों में समझाती हैं। कहीं वह सृष्टि का प्रथम प्रकट सिद्धांत है, कहीं प्रजापति से उसका संबंध स्थापित होता है, कहीं ब्रह्मा से उसका संबंध समझाया जाता है और कहीं वह समष्टि प्राण तथा सूक्ष्म जगत का प्रतीक बन जाता है। यही कारण है कि हिरण्यगर्भ के विषय में एक ही सरल परिभाषा देकर आगे बढ़ जाना उचित नहीं है।
पुराणों में सृष्टि की उत्पत्ति से संबंधित एक अत्यंत प्रसिद्ध प्रतीक “ब्रह्मांड” है। ब्रह्मांड शब्द में ही “अंड” उपस्थित है। पुराणिक ब्रह्मांड-विज्ञान में एक ब्रह्मांडीय अंडे की कल्पना मिलती है जिसके भीतर लोकों और सृष्टि की व्यवस्था विकसित होती है। इस कारण लोकप्रिय धार्मिक वर्णनों में हिरण्यगर्भ और ब्रह्मांड-अंड की धारणाएँ कई बार एक-दूसरे में मिल जाती हैं। लेकिन यहाँ सावधानी आवश्यक है। हर ग्रंथ एक ही भाषा और एक ही दार्शनिक उद्देश्य से बात नहीं करता। वेद का मंत्र, उपनिषद का चिंतन और पुराण की कथा—तीनों की अभिव्यक्ति अलग हो सकती है। इन्हें एक-दूसरे का शाब्दिक अनुवाद समझना ठीक नहीं होगा।
हिरण्यगर्भ की धारणा का एक अत्यंत सुंदर विस्तार श्वेताश्वतर उपनिषद में भी दिखाई देता है, जहाँ उस परम देव के संबंध में कहा गया है जिसने प्रारंभ में ब्रह्मा या हिरण्यगर्भ को उत्पन्न किया और उसे वेदज्ञान प्रदान किया। यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर सामने आता है। यदि हिरण्यगर्भ स्वयं किसी परम सत्ता से प्रकट है, तो वह अंतिम परम सत्य नहीं, बल्कि सृष्टि के प्रकट क्रम में एक अत्यंत उच्च सिद्धांत है। वेदांत में यही अंतर ब्रह्म और हिरण्यगर्भ के बीच समझने में सहायता करता है। ब्रह्म अंतिम, निरपेक्ष सत्य है। वह किसी कारण से उत्पन्न नहीं होता। हिरण्यगर्भ सृष्टि की प्रकट व्यवस्था से जुड़ा है। इसलिए हिरण्यगर्भ कितना ही महान क्यों न हो, वह उस परम निर्गुण ब्रह्म के समानार्थी हर संदर्भ में नहीं माना जा सकता।
यहीं से एक अद्भुत आध्यात्मिक प्रश्न उत्पन्न होता है। यदि ब्रह्मांड के प्रकट होने से पहले एक सूक्ष्म संभाव्यता थी, तो क्या मनुष्य के भीतर भी प्रत्येक विचार के जन्म से पहले कोई ऐसी अवस्था होती है? ध्यान से देखने पर हम पाते हैं कि कोई विचार अचानक मन में दिखाई देता है। उसके प्रकट होने से एक क्षण पहले वह स्पष्ट शब्दों में उपस्थित नहीं था। फिर वह विचार बनता है, उससे इच्छा बनती है, इच्छा से कर्म और कर्म से परिणाम उत्पन्न होता है। अर्थात हमारे छोटे से मानसिक संसार में भी अप्रकट से प्रकट होने की प्रक्रिया निरंतर चल रही है। यही कारण है कि भारतीय दर्शन बाहरी ब्रह्मांड और आंतरिक चेतना के अध्ययन को पूरी तरह अलग नहीं करता। ऋषि केवल यह नहीं पूछते कि संसार कहाँ से आया; वे यह भी पूछते हैं—“मैं कौन हूँ जो इस संसार को जान रहा हूँ?”
हिरण्यगर्भ की धारणा हमें इसी सीमा पर खड़ा करती है। एक ओर विशाल ब्रह्मांड है, दूसरी ओर उसे जानने वाली चेतना। और प्रश्न यह है कि दोनों का मूल क्या है? ऋग्वेद का हिरण्यगर्भ सूक्त केवल सृष्टि के पदार्थों की सूची नहीं देता। उसमें जीवन, बल, मृत्यु, अमरत्व, दिशाएँ, पृथ्वी और आकाश जैसी अवधारणाएँ एक मूल सत्ता के संदर्भ में आती हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि वैदिक ऋषि सृष्टि की उत्पत्ति को केवल मिट्टी, जल या अग्नि जैसी भौतिक वस्तुओं के बनने तक सीमित नहीं देख रहे थे। वे अस्तित्व की संपूर्ण व्यवस्था के मूल को खोज रहे थे।
हिरण्यगर्भ के साथ जल का संबंध भी भारतीय सृष्टि-वर्णनों में महत्वपूर्ण है। अनेक प्राचीन कथाओं में प्रारंभिक अवस्था को जल से जोड़ा गया है। लेकिन इन “आदि जलों” को आधुनिक समुद्र के समान समझना आवश्यक नहीं। प्राचीन धार्मिक भाषा में जल अव्यक्त संभाव्यता, जीवन और उत्पत्ति का शक्तिशाली प्रतीक भी हो सकता है। बाद के पुराणिक वर्णनों में नारायण का कारण-जल पर शयन, नाभि से कमल का प्रकट होना और उस कमल पर ब्रह्मा का प्रादुर्भाव अत्यंत प्रसिद्ध है। इस चित्र में भी एक गहरी संरचना दिखाई देती है—अव्यक्त आधार, उससे प्रकट होने वाला सृजन केंद्र और फिर व्यवस्थित जगत की रचना। यहाँ विष्णु, नारायण, ब्रह्मा, कमल और जल केवल कहानी के पात्र नहीं रह जाते; वे सृष्टि के अलग-अलग सिद्धांतों को समझाने वाले प्रतीक भी बनते हैं।
ब्रह्मा का जन्म स्वयं एक गहरा रहस्य है। कई पुराणिक परंपराओं में ब्रह्मा जब प्रकट होते हैं, तब उन्हें तत्काल यह ज्ञात नहीं होता कि वे कहाँ से आए हैं। वे कमल के मूल को खोजने का प्रयास करते हैं। यह कथा केवल ब्रह्मा की यात्रा नहीं, बल्कि प्रत्येक जिज्ञासु जीव की स्थिति जैसी प्रतीत होती है। मनुष्य भी संसार में आँख खोलता है और पूछता है—मैं कहाँ से आया? इस जगत का आधार क्या है? मेरे अस्तित्व का मूल कहाँ है? ब्रह्मा कमल के मूल को बाहर खोजते हैं, लेकिन अंततः उन्हें ज्ञान तप और आंतरिक अनुभूति की दिशा में मिलता है। यही सनातन परंपरा का अत्यंत सुंदर संदेश है—सृष्टि का अंतिम रहस्य केवल बाहर खोजने से नहीं मिलता; खोजकर्ता को स्वयं अपनी चेतना की गहराई में उतरना पड़ता है।
हिरण्यगर्भ का स्वर्णिम स्वरूप भी इसी आंतरिक प्रकाश की ओर संकेत कर सकता है। उपनिषदों में आत्मा और ब्रह्म के संदर्भ में प्रकाश की भाषा बार-बार आती है। लेकिन यह प्रकाश सूर्य या दीपक जैसा भौतिक प्रकाश नहीं है। यह ज्ञान का प्रकाश है—वह चेतना जिसके कारण सभी अनुभव संभव होते हैं। हम सूर्य को देखते हैं क्योंकि आँखें हैं। आँखों से प्राप्त संकेतों को मन ग्रहण करता है। लेकिन मन को कौन जानता है? जब हम कहते हैं, “मेरे मन में विचार चल रहे हैं,” तो विचारों को जानने वाला कौन है? यही प्रश्न धीरे-धीरे साधक को बाहरी ब्रह्मांड से भीतर की चेतना की ओर ले जाता है। हिरण्यगर्भ की खोज अंततः केवल ब्रह्मांड की उम्र या आकार जानने की खोज नहीं रह जाती। वह अस्तित्व के मूल की खोज बन जाती है।
यहाँ आधुनिक विज्ञान और सनातन दर्शन के बीच अनावश्यक समानता स्थापित करने से बचना भी जरूरी है। कभी-कभी हिरण्यगर्भ को सीधे आधुनिक “बिग बैंग” सिद्धांत के बराबर बता दिया जाता है। ऐसा दावा ऐतिहासिक और वैज्ञानिक दोनों दृष्टियों से सावधानी मांगता है। आधुनिक ब्रह्मांड विज्ञान गणितीय मॉडल, खगोलीय निरीक्षण, ब्रह्मांडीय विस्तार और भौतिक प्रमाणों पर आधारित है; हिरण्यगर्भ वैदिक धार्मिक-दर्शनिक चिंतन की अवधारणा है। दोनों में “प्रारंभिक अवस्था से ब्रह्मांड के प्रकट होने” जैसा व्यापक साम्य हमें रोचक लग सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि ऋग्वेद आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धांत को उसी तकनीकी अर्थ में बता रहा था। सनातन ग्रंथों की महत्ता सिद्ध करने के लिए उन्हें आधुनिक विज्ञान की पुस्तक बनाने की आवश्यकता नहीं है। उनका अपना प्रश्न है, अपनी भाषा है और अपना दार्शनिक महत्व है।
वास्तव में हिरण्यगर्भ की महानता इसी में है कि हजारों वर्ष पहले मनुष्य ने आकाश की ओर देखकर केवल देवताओं से वर्षा नहीं माँगी, बल्कि उसने पूछा—इस संपूर्ण अस्तित्व के पीछे प्रथम सिद्धांत क्या है? यह प्रश्न आज भी समाप्त नहीं हुआ। विज्ञान पदार्थ और ब्रह्मांड के प्रारंभिक इतिहास को समझने का प्रयास करता है। दर्शन पूछता है कि “अस्तित्व” का अर्थ क्या है। अध्यात्म पूछता है कि उस अस्तित्व को जानने वाली चेतना कौन है। हिरण्यगर्भ इन प्रश्नों के बीच खड़ा एक प्राचीन प्रतीक है।
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि हिरण्यगर्भ को कभी-कभी ब्रह्मा का पर्याय मान लिया जाता है। यह कुछ परंपरागत संदर्भों में स्वीकार्य हो सकता है, लेकिन प्रत्येक वैदिक संदर्भ में दोनों को बिल्कुल समान मान लेना उचित नहीं। वैदिक हिरण्यगर्भ की अवधारणा पुराणिक ब्रह्मा की विस्तृत कथाओं से पहले की है। समय के साथ धार्मिक और दार्शनिक अवधारणाएँ एक-दूसरे से जुड़ती गईं और हिरण्यगर्भ, प्रजापति तथा ब्रह्मा के बीच संबंध अधिक स्पष्ट होते गए। यही विकास सनातन साहित्य की विशेषता है। एक मूल वैदिक संकेत बाद के ग्रंथों में कथा बनता है, दर्शन बनता है, ध्यान का विषय बनता है और फिर लोकपरंपरा में प्रतीक के रूप में जीवित रहता है।
हिरण्यगर्भ का संबंध योग परंपरा में भी रोचक रूप से सामने आता है। पतंजलि योगसूत्र की परंपरागत व्याख्याओं में “हिरण्यगर्भ” को योग के प्राचीन प्रवर्तक के रूप में स्मरण किए जाने की परंपरा मिलती है, यद्यपि इस विषय में विभिन्न ग्रंथों और टीकाओं की भाषा अलग-अलग है। इससे पता चलता है कि हिरण्यगर्भ केवल ब्रह्मांड उत्पत्ति की अवधारणा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ज्ञान और योग की आदिम परंपरा से भी जोड़ा गया। इसका आध्यात्मिक अर्थ अत्यंत सुंदर है। जिस सिद्धांत से जगत का क्रम प्रकट होता है, उसी से ज्ञान का क्रम भी प्रकट होता है। अव्यवस्था से व्यवस्था, अंधकार से प्रकाश, अज्ञान से ज्ञान और अप्रकट से प्रकट—हिरण्यगर्भ इन सभी यात्राओं का प्रतीक बन जाता है।
मनुष्य के भीतर भी एक “हिरण्यगर्भ” जैसी संभावना छिपी हुई है—यह शास्त्र का शाब्दिक कथन नहीं, बल्कि इस प्रतीक से निकाली जा सकने वाली आध्यात्मिक व्याख्या है। हमारे भीतर ऐसी क्षमताएँ, विचार और ज्ञान हो सकते हैं जो अभी प्रकट नहीं हुए हैं। जैसे ब्रह्मांडीय गर्भ में सृष्टि की संभावना की कल्पना की गई, वैसे ही मानव चेतना में भी आत्मबोध की संभावना उपस्थित है। लेकिन इस संभावना को प्रकट करने के लिए केवल जानकारी पर्याप्त नहीं है। ऋषियों की परंपरा बार-बार तप, ध्यान, स्वाध्याय, सत्य और संयम की ओर लौटती है। इसका कारण यही है कि अंतिम ज्ञान केवल सुना हुआ ज्ञान नहीं हो सकता। उसे जीवन में उतरना पड़ता है।
हिरण्यगर्भ हमें एक और महत्वपूर्ण बात समझाता है—प्रकट जगत अंतिम सत्य नहीं है। हम जो कुछ देखते हैं, वह किसी गहरे आधार पर निर्भर है। एक लहर को देखकर यदि हम केवल लहर को ही सत्य मान लें और समुद्र को भूल जाएँ, तो हमारी समझ अधूरी होगी। उसी प्रकार नाम और रूपों से भरे संसार के पीछे उस आधार को खोजना भारतीय दर्शन की मूल प्रवृत्ति रही है। लेकिन हिरण्यगर्भ स्वयं भी अंतिम पड़ाव नहीं है। उपनिषदों और वेदांत की दिशा हमें उससे भी आगे ले जाती है—उस परम ब्रह्म की ओर, जो प्रकट और अप्रकट दोनों का आधार है। यहीं हिरण्यगर्भ का सबसे बड़ा रहस्य खुलता है। जिसे हम सृष्टि का आरंभ समझ रहे थे, वह भी किसी और गहरे सत्य पर आश्रित हो सकता है।
यदि हिरण्यगर्भ प्रथम प्रकट सिद्धांत है, तो प्रश्न फिर उठता है—उसके पीछे कौन है? ऋग्वेद का हिरण्यगर्भ सूक्त इसी प्रश्न को ईश्वर की ओर मोड़ता है। उपनिषद इसे ब्रह्म की खोज की ओर ले जाते हैं। पुराण इसे दिव्य सृष्टि-कथाओं के माध्यम से जनमानस तक पहुँचाते हैं। और साधक के लिए यही प्रश्न अंततः भीतर लौट आता है—जिस चेतना से मैं हिरण्यगर्भ के विषय में सोच रहा हूँ, उस चेतना का मूल क्या है?
यदि इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार किया जाए, तो हिरण्यगर्भ की कथा केवल “ब्रह्मांड कैसे बना?” की कथा नहीं रहती। वह “मैं कौन हूँ?” की खोज बन जाती है। यही सनातन ज्ञान की विशेषता है। विशाल ब्रह्मांड की खोज अंततः मनुष्य को अपने हृदय की गहराई तक पहुँचा देती है। इसलिए हिरण्यगर्भ को केवल एक स्वर्णिम अंडे की विचित्र कथा समझना उसके वास्तविक महत्व को छोटा करना होगा। वह सृष्टि की प्रथम संभावना, प्रकाश, जीवन, समष्टि चेतना और अस्तित्व के मूल कारण की खोज से जुड़ा एक अत्यंत प्राचीन वैदिक प्रतीक है।
और शायद उसका सबसे सुंदर संदेश यही है कि प्रत्येक प्रकट वस्तु के पीछे एक अप्रकट संभावना होती है।
वृक्ष के पीछे बीज है।
शब्द के पीछे मौन है।
विचार के पीछे चेतना है।
सृष्टि के पीछे कारण है।
और कारणों की अंतिम श्रृंखला के पार वह प्रश्न खड़ा है, जिसका उत्तर ऋषियों ने केवल तर्क से नहीं, अनुभूति से खोजने का प्रयास किया—इस सबका परम आधार कौन है? हिरण्यगर्भ का रहस्य हमें उसी प्रश्न के द्वार तक पहुँचाता है।
इस विषय का प्रमुख प्राचीन आधार ऋग्वेद के दशम मंडल का हिरण्यगर्भ सूक्त, ऋग्वेद 10.121 है। हिरण्यगर्भ से संबंधित विचार उपनिषदों, विशेषकर श्वेताश्वतर उपनिषद, तथा बाद की वेदांत परंपराओं में भी विकसित रूप में मिलते हैं। ब्रह्मांडीय अंड, ब्रह्मा और पुराणिक सृष्टि-वर्णन विष्णु पुराण, भागवत पुराण तथा अन्य पुराणों में विभिन्न रूपों में प्राप्त होते हैं। अलग-अलग ग्रंथों के वर्णनों को बिल्कुल एक जैसा मानने के बजाय उनके संदर्भ और दार्शनिक उद्देश्य को अलग-अलग समझना उचित है।
✍️ लेखक: डॉ. मनोहर शुक्ल – गुप्त और रहस्यमय कथाओं के विशेषज्ञ
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