भस्मासुर और मोहिनी — जब अहंकार स्वयं का विनाश बन जाता है
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं तुम्हें वह कथा सुनाने आया हूँ जहाँ अहंकार ने वरदान को ही अपना विनाश बना लिया, और जहाँ भगवान ने युद्ध नहीं, बुद्धि और माया से अधर्म का अंत किया। यह कथा है भस्मासुर और भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार की—एक ऐसी लीला जो सिखाती है कि शक्ति बिना विवेक के स्वयं को ही भस्म कर देती है।
बहुत प्राचीन काल में भस्मासुर नाम का एक असुर था, जो अत्यंत महत्वाकांक्षी और उग्र स्वभाव का था। उसने कठोर तप किया और भगवान शिव को प्रसन्न कर लिया। तप की पराकाष्ठा देखकर शिव प्रसन्न हुए और वरदान देने को तैयार हो गए। भस्मासुर ने ऐसा वर माँगा जिसने स्वयं वरदाता को भी संकट में डाल दिया—उसने कहा कि जिसके सिर पर वह अपना हाथ रखे, वह उसी क्षण भस्म हो जाए। शिव ने वर दे दिया, क्योंकि देवता अपने वचन से नहीं फिरते।
पर वरदान मिलते ही भस्मासुर का विवेक नष्ट हो गया। उसने उसी क्षण भगवान शिव के सिर पर हाथ रखने का प्रयास किया। शिव समझ गए कि वरदान का दुरुपयोग हो रहा है। वे भस्मासुर से बचते हुए वहाँ से चले और अंततः भगवान विष्णु की शरण ली। तब विष्णु ने युद्ध नहीं चुना—उन्होंने मोहिनी का रूप धारण किया, एक ऐसा दिव्य सौंदर्य और बुद्धि का संगम, जो अहंकार को उसी की ही परछाईं में उलझा देता है।
मोहिनी के रूप में विष्णु भस्मासुर के सामने प्रकट हुए। भस्मासुर मोहित हो गया। मोहिनी ने मुस्कराकर कहा कि वह उससे विवाह करेगी, पर उससे पहले एक नृत्य प्रतियोगिता होगी—जो जैसा करे, वैसा ही दूसरा भी करे। भस्मासुर सहमत हो गया। नृत्य आरम्भ हुआ। मोहिनी के हर अंग-संचालन की नकल करते हुए भस्मासुर आगे बढ़ता गया। अंततः मोहिनी ने अपने हाथ को अपने सिर पर रखा। मोहित भस्मासुर ने भी वही किया—और उसी क्षण वह स्वयं भस्म हो गया। वरदान ने ही अपना न्याय कर दिया।
इस प्रकार बिना किसी अस्त्र के, बिना किसी युद्ध के, अधर्म का अंत हुआ। भगवान शिव सुरक्षित हुए और सृष्टि का संतुलन बना रहा। इस लीला का सार यह है कि ईश्वर केवल बल से नहीं, बोध से भी रक्षा करते हैं। अहंकार जब विवेक से कट जाता है, तब वह अपने ही बनाए नियमों में फँसकर नष्ट हो जाता है।
यह कथा हमें यह सिखाती है कि हर शक्ति के साथ जिम्मेदारी आती है। वरदान, पद, ज्ञान—यदि विनम्रता और विवेक से न जुड़े हों, तो वे रक्षा नहीं, विनाश बन जाते हैं। मोहिनी कोई छल नहीं, वह माया का वह दर्पण है जिसमें असत्य स्वयं को पहचान लेता है—और मिट जाता है।
स्रोत / संदर्भ
यह कथा शिव पुराण तथा विष्णु पुराण में भस्मासुर–मोहिनी लीला के रूप में वर्णित है।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
🙏 Support Us / Donate Us
हम सनातन ज्ञान, धर्म–संस्कृति और आध्यात्मिकता को सरल भाषा में लोगों तक पहुँचाने का प्रयास कर रहे हैं। यदि आपको हमारा कार्य उपयोगी लगता है, तो कृपया सेवा हेतु सहयोग करें। आपका प्रत्येक योगदान हमें और बेहतर कंटेंट बनाने की शक्ति देता है।
Donate Now
UPI ID: ssdd@kotak

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें