अगर सनातन इतना सही है, तो इसे बदनाम क्यों किया गया?
अगर सनातन इतना सही है, तो इसे बदनाम क्यों किया गया?
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
यह लेख बचाव में नहीं है। यह लेख जांच में है। क्योंकि जो सच होता है, वह सफाई नहीं देता—वह सवाल सहता है।
पहला सवाल सीधा है—अगर सनातन वाकई बेकार होता, तो उसे इतना गलत साबित करने की ज़रूरत क्यों पड़ती?
कोई भी कमजोर चीज़ अपने आप गिर जाती है। उसे गिराने के लिए इतनी किताबें, इतने memes, इतनी debates, इतना narrative—क्यों?
सच यह है—सनातन को कभी समझा नहीं गया, उसे सिर्फ simplify करके दिखाया गया।
उसे बताया गया—मूर्तिपूजा = अंधविश्वास। संस्कार = पाखंड। गुरु = exploit। परंपरा = backward।
क्योंकि जब तुम किसी चीज़ को उसकी गहराई से काट देते हो, तो वह मज़ाक लगने लगती है।
यह वही तकनीक है जो हर शक्तिशाली विचार के साथ होती है—पहले उसे छोटा दिखाओ, फिर उसे outdated कहो, फिर कहो—“अब इसकी ज़रूरत नहीं।”
पर ज़रा सोचो—जो धर्म तुम्हें सवाल करना सिखाता है, वह अंधा कैसे हो सकता है?
जो दर्शन कर्तव्य, विवेक और करुणा एक साथ सिखाए, वह हिंसक कैसे हो सकता है?
अगर सनातन इतना ही oppressive होता, तो उसमें नास्तिक दर्शन क्यों होते? चार्वाक क्यों होता? वेदांत में तर्क क्यों होता?
और अगर यह सिर्फ ritual होता, तो युद्धभूमि में भगवद्गीता जीवन का psychology क्यों सिखाती?
सच यह है—सनातन से समस्या उसके rituals से नहीं है। समस्या है उसकी स्वतंत्रता से।
यह धर्म तुम्हें डराकर नहीं चलाता। यह तुम्हें guilt में नहीं बांधता। यह तुम्हें एक किताब में कैद नहीं करता।
और जो सिस्टम control पर चलता है, उसे यही बात सबसे ज़्यादा परेशान करती है।
क्योंकि जो इंसान खुद से जुड़ा हो, वह blind follower नहीं बनता। वह सवाल करता है। वह तुलना करता है। वह चुनता है।
इसलिए सनातन को बदनाम करना ज़रूरी था—ताकि युवा कभी उसके पास पूरे मन से जाए ही न।
उसे आधा दिखाया गया। उसे गलत context में रखा गया। उसे पुराने लोगों की चीज़ बताया गया।
पर सच यह है—सनातन कभी “पुराना” नहीं था। वह गहरा था। और गहराई हमेशा आलसी नजरों को असहज करती है।
यह लेख किसी को दोष देने के लिए नहीं है। यह लेख तुम्हें यह याद दिलाने के लिए है—कि जो चीज़ तुम्हें सोचने पर मजबूर करे, वही सबसे पहले “problematic” कहलाती है।
🕉️ मैं हिन्दू हूँ। क्योंकि मैंने सुना नहीं—मैंने समझने की कोशिश की।
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