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देवी खड्गमाला स्तोत्र: श्रीविद्या साधना और आत्मशुद्धि का महामार्ग।

देवी खड्गमाला स्तोत्र: श्रीविद्या साधना और आत्मशुद्धि का महामार्ग।

देवी खड्गमाला स्तोत्र : श्रीविद्या की रहस्यमयी शक्ति परंपरा

खड्गमाला स्तोत्र अज्ञान को काटने वाला ज्ञान का खड्ग है। जानिए श्रीचक्र के नौ आवरणों की इस रहस्यमयी साधना और इसके आध्यात्मिक लाभों के बारे में

सनातन साधना परंपरा में देवी खड्गमाला स्तोत्र को अत्यंत गूढ़, दिव्य और प्रभावशाली स्तोत्र माना गया है। इसे “श्री शुद्ध शक्ति माला महामंत्र” भी कहा जाता है। यह कोई साधारण स्तुति नहीं, बल्कि श्रीचक्र (श्रीयंत्र) के नौ आवरणों में स्थित देवी शक्तियों का क्रमबद्ध आवाहन है, जिसमें साधक स्वयं को देवी ललिता त्रिपुरसुंदरी की चेतना से जोड़ता है।

यह स्तोत्र श्रीविद्या साधना का हृदय है, जहाँ खड्ग ज्ञान का प्रतीक है और माला भक्ति का। ज्ञान और भक्ति का यही संगम साधक को भय, अज्ञान और बंधनों से मुक्त करता है।

देवी स्तोत्र

नमो देव्यै प्रकृत्यै च विधात्र्यै सततं नमः।
कल्याण्यै कामदायै च वृद्धयै सिद्धयै नमो नमः।

सच्चिदानन्दरूपिण्यै संसारारणयै नमः।
पंचकृत्यविधात्र्यै ते भुवनेश्यै नमो नमः।

सर्वाधिष्ठानरूपायै कूटस्थायै नमो नमः।
अर्धमात्रार्थभूतायै हृल्लेखायै नमो नमः।

ज्ञातं मयाऽखिलमिदं त्वयि सन्निविष्टं।
त्वत्तोऽस्य सम्भवलयावपि मातरद्य।
शक्तिश्च तेऽस्य करणे विततप्रभावा।
ज्ञाताधुना सकललोकमयीति नूनम्।

विस्तार्य सर्वमखिलं सदसद्विकारं।
सन्दर्शयस्यविकलं पुरुषाय काले।
तत्त्वैश्च षोडशभिरेव च सप्तभिश्च।
भासीन्द्रजालमिव नः किल रंजनाय।

न त्वामृते किमपि वस्तुगतं विभाति।
व्याप्यैव सर्वमखिलं त्वमवस्थिता सि।
शक्तिं विना व्यवहृतो पुरुषोऽप्यशक्तो।
बम्भण्यते जननि बुद्धिमता जनेन।

प्रीणासि विश्वमखिलं सततं प्रभावैः।
स्वैस्तेजसा च सकलं प्रकटीकरोषि।
अस्त्येव देवि तरसा किल कल्पकाले।
को वेद देवि चरितं तव वैभवस्य।

त्राता वयं जननि ते मधुकैटभाभ्यां।
लोकाश्च ते सुवितता खलु दर्शिता वै।
नीता सुखस्य भवने परमां च कोटिं।
यद्दर्शनं तव भवानि महाप्रभावम्।

नाहं भवो न च विरिञ्चि विवेद मातः।
कोऽन्यो हि वेत्ति चरितं तव दुर्विभाव्यम्।
कानीह सन्ति भुवनानि महाप्रभावे।
ह्यस्मिन्भवानि रचिते रचनाकलापे।

अस्माभिरत्र भुवे हरिरन्य एव।
दृष्टः शिवः कमलजः प्रथितप्रभावः।
अन्येषु देवि भुवनेषु न सन्ति किं ते।
किं विद्य देवि विततं तव सुप्रभावम्।

याचेऽम्ब तेऽङ्घ्रिकमलं प्रणिपत्य कामं।
चित्ते सदा वसतु रूपमिदं तवैतत्।
नामापि वक्त्रकुहरे सततं तवैव।
संदर्शनं तव पदाम्बुजयोः सदैव।

भृत्योऽयमस्ति सततं मयि भावनीयं।
त्वां स्वामिनीति मनसा ननु चिन्तयामि।
एषाऽवयोरविरता किल देवि भूया।
द्वयाप्तिः सदैव जननीसुतयोरिवार्ये।

त्वं वेत्सि सर्वमखिलं भुवनप्रपञ्चं।
सर्वज्ञता परिसमाप्तिनितान्तभूमिः।
किं पामरेण जगदम्ब निवेदनीयं।
यद्युक्तमाचर भवानि तवेंगितं स्यात्।

ब्रह्मा सृजत्यवति विष्णुरुमापतिश्च।
संहारकारक इयं तु जने प्रसिद्धिः।
किं सत्यमेतदपि देवि तवेच्छया वै।
कर्तुं क्षमा वयमजे तव शक्तियुक्ताः।

धात्री धराधरसुते न जगद् बिभर्ति।
आधारशक्तिरखिलं तव वै बिभर्ति।
सूर्योऽपि भाति वरदे प्रभया युतस्ते।
त्वं सर्वमेतदखिलं विरजा विभासि।

ब्रह्माहमीश्वरवरः किल ते प्रभावात्।
सर्वे वयं जनियुता न यदा तु नित्याः।
केऽन्ये सुराः शतमखप्रमुखाश्च नित्याः।
नित्या त्वमेव जननी प्रकृतिः पुराणा।

त्वं चेद्भवानि दयसे पुरुषं पुराणं।
जानेऽहमद्य तव सन्निधिगः सदैव।
नोचेदहं विभुरनादिरनीह ईशो।
विश्वात्मधीरिति तमःप्रकृतिः सदैव।

विद्या त्वमेव ननु बुद्धिमतां नराणां।
शक्तिस्त्वमेव किल शक्तिमतां सदैव।
त्वं कीर्तिकान्तिकमलामलतुष्टिरूपा।
मुक्तिप्रदा विरतिरेव मनुष्यलोके।

गायत्र्यसि प्रथमवेदकला त्वमेव।
स्वाहा स्वधा भगवती सगुणार्धमात्रा।
आम्नाय एव विहितो निगमो भवत्या।
संजीवनाय सततं सुरपूर्वजानाम्।

मोक्षार्थमेव रचयस्यखिलं प्रपञ्चं।
तेषां गताः खलु यतो ननु जीवभाम्।
अंशा अनादिनिधनस्य किलानघस्य।
पूर्णार्णवस्य वितता हि यथा तरंगाः।

जीवो यदा तु परिवेत्ति तवैव कृत्यं।
त्वं संहरस्यखिलमेतदिति प्रसिद्धम्।
नाट्यं नटेन रचितं वितथेऽन्तरंगे।
कार्ये कृते विरमसे प्रथितप्रभावा।

त्राता त्वमेव मम मोहमयाद्भवाब्धेः।
त्वामम्बिके सततमेमि महार्तिदे च।
रागादिभिर्विरचिते वितथे किलान्ते।
मामेव पाहि बहुदुःखकरे च काले।

नमो देवि महाविद्ये नमामि चरणौ तव।
सदा ज्ञानप्रकाशं मे देहि सर्वार्थदे शिवे।

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणे तृतीयस्कन्धे विष्णुना कृतं देवीस्तोत्रं।

खड्गमाला का आध्यात्मिक अर्थ

देवी खड्गमाला में साधक श्रीचक्र के प्रत्येक आवरण में स्थित देवियों को नामपूर्वक नमस्कार करता है। यह प्रक्रिया केवल उच्चारण नहीं, बल्कि आंतरिक आरोहण है— बाह्य चेतना से अंतःचेतना की ओर यात्रा। श्रीचक्र के नौ आवरण मनुष्य के भीतर स्थित नौ स्तरों के प्रतीक हैं।

जब साधक क्रमशः इन आवरणों का स्मरण करता है, तो मन की अशुद्धियाँ शांत होती हैं, ऊर्जा केंद्र जाग्रत होते हैं, आत्मबल और विवेक बढ़ता है और साधक धीरे-धीरे परम चेतना के समीप पहुँचता है। इसी कारण इसे “सर्वसिद्धिदायिनी विद्या” कहा गया है।

साधना का स्वरूप

परंपरा के अनुसार यह स्तोत्र पूर्व दिशा की ओर मुख करके, दीप प्रज्वलित कर, पवित्र भाव से किया जाता है। यह साधना महाकाली की संरक्षण शक्ति, त्रिपुरसुंदरी की सौंदर्य व चेतना शक्ति और अन्य देवी रूपों की सूक्ष्म ऊर्जा को जाग्रत करती है। यह स्तोत्र भय-नाशक, रोग-शामक और बाधा-निवारक माना गया है।

साधक के लिए फल (आध्यात्मिक लाभ)

शास्त्रीय परंपरा के अनुसार, श्रद्धा से किया गया खड्गमाला पाठ साधक को आत्मिक सुरक्षा और मानसिक स्थिरता, नकारात्मक शक्तियों से रक्षा, रोग, भय और विघ्नों से मुक्ति, गृह-शांति, सौभाग्य और समृद्धि प्रदान करता है तथा धीरे-धीरे मोक्ष-मार्ग की ओर अग्रसर करता है।

पाठ की सामान्य विधि

स्वच्छ स्थान पर बैठकर, प्रातः या संध्या समय इसका पाठ श्रेष्ठ माना गया है। हल्के रंग या लाल-पीले वस्त्र धारण करें। कुशा, ऊन या लाल कपड़े का आसन उपयुक्त माना जाता है। देवी ललिता या श्रीचक्र के समक्ष दीप जलाएँ। फूल, धूप और नैवेद्य अर्पित करें।

कुछ क्षण मौन रखकर देवी का ध्यान करें। बीज मंत्रों का अल्प जप कर मन को एकाग्र करें। पूरे स्तोत्र का पाठ श्रद्धा और शुद्ध उच्चारण के साथ करें। समापन पर देवी से भौतिक नहीं, बल्कि भक्ति, विवेक और शुद्ध चेतना की प्रार्थना करें।

विशेष मार्गदर्शन

यह साधना स्त्री-पुरुष सभी कर सकते हैं। गुरु-कृपा से इसका प्रभाव कई गुना बढ़ता है। नवरात्रि, पूर्णिमा और शुक्रवार विशेष फलदायी माने गए हैं। साधना में अहंकार नहीं, समर्पण आवश्यक है।

आध्यात्मिक निष्कर्ष

देवी खड्गमाला स्तोत्र हमें यह स्मरण कराता है कि देवी बाहर नहीं, भीतर जाग्रत होती हैं। जब साधक श्रद्धा से नाम लेता है, तो देवी का खड्ग अज्ञान को काटता है और माला भक्ति से जीवन को सुशोभित करती है। यह स्तोत्र केवल सिद्धि का साधन नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और आत्मसाक्षात्कार का मार्ग है।

लेखक / Writer : द्विवेदी 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद


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