ध्रुव की कथा — अटल संकल्प से अमर स्थान तक
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं तुम्हें उस बालक की कथा सुनाने आया हूँ जिसने अपमान को साधना बनाया, आँसुओं को तप में बदला और अंततः आकाश में अटल स्थान पाया। यह कथा है ध्रुव की। यह कथा बताती है कि जब संकल्प शुद्ध हो और लक्ष्य अडिग, तब आयु बाधा नहीं बनती, और बाल्य भी ब्रह्मज्ञान का द्वार खोल देता है।
राजा उत्तानपाद के महल में ध्रुव नाम का एक बालक रहता था। उसकी माता सुनीति सरल, शांत और धर्मनिष्ठ थीं, जबकि दूसरी रानी सुरुचि का प्रभाव अधिक था। एक दिन ध्रुव बालहठ में पिता की गोद में बैठना चाहता था, पर सुरुचि ने उसे कठोर शब्दों में रोक दिया और कहा कि यदि वह सिंहासन चाहता है तो अगले जन्म में आकर उसके गर्भ से जन्म ले। यह वचन बालक के हृदय में तीर की तरह लगा।
ध्रुव रोते हुए अपनी माता के पास पहुँचा। सुनीति ने उसे बदला नहीं सिखाया, बल्कि धर्म का मार्ग बताया। उन्होंने कहा कि यदि तुझे स्थायी सम्मान चाहिए, तो ईश्वर की शरण ले। यह वाक्य ध्रुव के भीतर गूंज गया और उसी क्षण उसने वन की ओर प्रस्थान करने का निश्चय कर लिया।
मार्ग में देवर्षि नारद मिले। उन्होंने ध्रुव की परीक्षा ली और उसे समझाया कि वह अभी छोटा है और उसे लौट जाना चाहिए। पर ध्रुव के नेत्रों में दृढ़ता थी। उसने कहा कि जो अपमान उसे मिला है, वह उसके भीतर अग्नि बन गया है और वह बिना लक्ष्य पाए लौटेगा नहीं। नारद ने उसके संकल्प को पहचाना और उसे वह मंत्र दिया जिसने उसके मन को एकाग्र कर दिया।
वन में ध्रुव ने कठोर तप आरम्भ किया। पहले फल-फूल का आहार, फिर सूखे पत्ते, फिर केवल जल और अंततः केवल श्वास पर टिके ध्यान में लीन हो गया। उसकी साधना से वन स्थिर हो गया, देवता चिंतित हुए और सृष्टि की धड़कन जैसे धीमी पड़ गई।
तब स्वयं भगवान विष्णु प्रकट हुए। उनके दर्शन से ध्रुव का हृदय पिघल गया। जिस सिंहासन की कामना लेकर वह चला था, वह क्षण भर में तुच्छ लगने लगा। ध्रुव ने कहा कि अब उसे कुछ नहीं चाहिए। प्रभु मुस्कराए और बोले कि जिसने मुझे इस आयु में पा लिया, उसके लिए कुछ भी तुच्छ नहीं। फिर भी उसके संकल्प का मान रखते हुए उन्होंने ध्रुव को आकाश में अचल स्थान प्रदान किया, जिसे ध्रुवतारा कहा गया।
ध्रुव लौटा, राज्य पाया, पर राज्य से बड़ा उसे वह बोध मिला जो जीवन को स्थिर करता है। उसकी कथा हमें यह सिखाती है कि चोट यदि भीतर उतर जाए और अहंकार न बने, तो वह साधना बन जाती है। और साधना यदि निरंतर हो, तो प्रभु स्वयं सामने आते हैं। अटलता बाहर की नहीं, भीतर की होनी चाहिए। तभी मनुष्य ध्रुव बनता है।
स्रोत और संदर्भ के रूप में यह कथा श्रीमद्भागवत महापुराण के चतुर्थ स्कंध में ध्रुव चरित्र के रूप में विस्तार से वर्णित है और विष्णु पुराण में भी इसका संकेत मिलता है।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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