धर्म केवल मंदिर तक सीमित नहीं
धर्म केवल मंदिर तक सीमित नहीं
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं उस सत्य को सरल शब्दों में प्रकट करना चाहता हूँ जिसे समझे बिना मनुष्य धर्म को बहुत छोटा कर देता है — धर्म केवल मंदिर तक सीमित नहीं है। यदि धर्म सचमुच केवल मंदिर की चार दीवारों में सिमटा होता, तो जीवन का अधिकांश भाग अधर्म ही कहलाता। क्योंकि मनुष्य मंदिर में थोड़े समय के लिए जाता है, पर जीवन तो हर क्षण जीता है। और जो हर क्षण साथ न चले, वह धर्म कैसे हो सकता है?
मंदिर धर्म का प्रतीक है, स्रोत नहीं। मंदिर स्मरण कराता है, सिखाता है, प्रेरणा देता है — पर धर्म वहीं से शुरू होकर वहीं समाप्त नहीं हो जाता। मंदिर में सिर झुकाना सरल है, पर बाहर निकलकर अहंकार झुकाना कठिन है। मंदिर में दीप जलाना आसान है, पर जीवन में अज्ञान का अंधकार मिटाना वास्तविक धर्म है। यदि मंदिर से बाहर निकलते ही हमारा व्यवहार, हमारी वाणी और हमारे कर्म वैसे ही कठोर, स्वार्थी और असंवेदनशील रह जाएँ, तो मंदिर-यात्रा अधूरी रह जाती है।
धर्म का वास्तविक क्षेत्र जीवन है — घर, कार्यस्थल, सड़क, समाज। जब कोई व्यक्ति घर में बुज़ुर्गों का सम्मान करता है, वहीं धर्म घटित होता है। जब कोई व्यक्ति अपने काम को ईमानदारी से करता है, वहीं धर्म जीवित होता है। जब कोई व्यक्ति कमजोर के साथ खड़ा होता है, वहीं धर्म प्रकट होता है। और जब कोई व्यक्ति लाभ होते हुए भी अन्याय नहीं करता, वहीं धर्म अपने पूरे वैभव में दिखाई देता है।
सनातन दृष्टि में धर्म का अर्थ है — धारण करना। जो जीवन को धारण करे, समाज को जोड़े, और मनुष्य को मनुष्य बनाए रखे — वही धर्म है। यदि मंदिर में की गई पूजा हमें अधिक संवेदनशील, अधिक सत्यनिष्ठ और अधिक करुणामय नहीं बनाती, तो वह केवल विधि रह जाती है, धर्म नहीं बन पाती।
धर्म केवल घंटी बजाने में नहीं, समय का सम्मान करने में भी है। धर्म केवल मंत्रों में नहीं, वचनों को निभाने में भी है। धर्म केवल प्रसाद चढ़ाने में नहीं, भूखे को भोजन देने में भी है। धर्म केवल मूर्ति के सामने हाथ जोड़ने में नहीं, टूटे हुए मनुष्य को सहारा देने में भी है।
मंदिर हमें यह याद दिलाने के लिए हैं कि जीवन पवित्र हो सकता है। पर जीवन को पवित्र बनाना हमारे कर्मों का दायित्व है। जो व्यक्ति मंदिर में शांत है पर बाहर क्रोधित, मंदिर में भक्त है पर बाहर कठोर, मंदिर में धार्मिक है पर बाहर अन्यायी — उसने धर्म को खंडों में बाँट दिया है। और खंडों में जिया गया धर्म अंततः खोखला हो जाता है।
सनातन धर्म ने कभी दोहरा जीवन नहीं सिखाया — एक मंदिर के लिए और एक संसार के लिए। उसने एक ही जीवन सिखाया — सजग, संतुलित और करुणामय। यही कारण है कि यहाँ कर्म को पूजा कहा गया, सेवा को साधना कहा गया, और परिश्रम को यज्ञ कहा गया। क्योंकि धर्म जीवन से भागने में नहीं, जीवन को सही ढंग से जीने में है।
धर्म यदि केवल मंदिर तक सीमित रह जाए, तो वह दूसरों को परखने का साधन बन जाता है — कौन आया, कौन नहीं आया। पर जब धर्म जीवन में उतरता है, तब वह स्वयं को साधने का माध्यम बनता है — मैं कैसा बोल रहा हूँ, मैं कैसा व्यवहार कर रहा हूँ, मैं कैसा मनुष्य बन रहा हूँ। यही आत्मपरीक्षण धर्म की आत्मा है।
मंदिर में जाना पवित्र है, पर उससे अधिक पवित्र है मंदिर से बाहर निकलकर भी वही पवित्रता बनाए रखना। वही शांति, वही विनम्रता, वही करुणा। क्योंकि ईश्वर केवल मूर्ति में नहीं, हर प्राणी में निवास करते हैं। और जहाँ ईश्वर सर्वत्र हैं, वहाँ धर्म को किसी एक स्थान तक कैसे बाँधा जा सकता है?
अंततः धर्म का उद्देश्य मनुष्य को बेहतर बनाना है, न कि उसे केवल धार्मिक कहलाने का प्रमाण देना। धर्म का फल व्यवहार में दिखना चाहिए, केवल पहचान में नहीं।
इसलिए स्मरण रहे —
मंदिर धर्म का द्वार है, घर उसका अभ्यास है।
मंदिर प्रेरणा है, जीवन परीक्षा है।
और धर्म केवल मंदिर तक सीमित नहीं, वह जीवन भर चलने वाली साधना है।
जो इस सत्य को समझ लेता है, वह मंदिर में भी धर्म जीता है और मंदिर के बाहर भी धर्म को जीवित रखता है।
लेखक: तु ना रिं 🔱
प्रकाशन: सनातन संवाद
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