सेवा ही परम धर्म: सनातन संस्कृति में निष्काम कर्म का मर्म
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं तुम्हें उस मार्ग की बात बताने आया हूँ जो न तो मंत्र माँगता है, न आसन, न मौन — बल्कि हाथों की गर्मी और हृदय की करुणा माँगता है — सेवा।
सनातन कहता है — धर्म केवल सोचने से पूरा नहीं होता, धर्म करने से प्रकट होता है। और करने का सबसे शुद्ध रूप है — सेवा।
सेवा का अर्थ किसी पर उपकार करना नहीं। सेवा का अर्थ है — अपने अहंकार को किनारे रखकर दूसरे के दुख को अपना समझना।
ऋषियों ने जंगलों में केवल ध्यान नहीं किया, उन्होंने अतिथि को भोजन कराया, रोगी को औषधि दी, और थके हुए को छाया दी।
क्योंकि सनातन जानता था — जिस हाथ ने किसी का भार उठाया, उसी हाथ से ईश्वर को छुआ जा सकता है।
सेवा में कोई ऊँच–नीच नहीं। देने वाला भी वही है, पाने वाला भी वही। केवल भूमिका बदलती है।
जो सेवा करता है, वह स्वयं हल्का हो जाता है। क्योंकि अहंकार सबसे भारी बोझ है।
सेवा दिखावे से मर जाती है। और चुपचाप किए गए छोटे कामों में अमर हो जाती है।
किसी भूखे को भोजन, किसी उदास को सुनना, किसी थके को रास्ता — ये सब पूजा हैं।
सनातन में मंदिर पत्थर का नहीं, करुणा का है। और उसकी घंटी शब्द नहीं, कर्म है।
जो सेवा में उतर गया, उसे मोक्ष की चिंता नहीं रहती। क्योंकि जिसके कर्म शुद्ध हैं, उसकी दिशा स्वयं शुद्ध हो जाती है।
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