राजा नहुष और अहंकार का पतन
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं तुम्हें वह कथा सुनाने आया हूँ जो यह बताती है कि जब अहंकार तपस्या के वेश में आता है, तब स्वयं भगवान को भी हस्तक्षेप करना पड़ता है। यह कथा है राजा नहुष और उनके पतन की, जो कभी इंद्रासन पर बैठे थे और अंत में सर्प बनकर धरती पर गिरे।
बहुत प्राचीन काल में देवताओं के राजा इंद्र ने वृत्रासुर का वध किया था। उस वध में ब्रह्महत्या का दोष लग गया और इंद्र लोकों से लुप्त हो गए। देवताओं ने ब्रह्मा जी से प्रार्थना की कि स्वर्ग का शासन कौन संभाले। तब ब्रह्मा जी ने महान राजा नहुष को, जो पृथ्वी पर धर्मपूर्वक शासन कर रहे थे, इंद्रासन पर बैठाया। नहुष अत्यंत तेजस्वी, तपस्वी और योग्य थे, इसलिए उन्हें स्वर्ग का राजा बना दिया गया।
स्वर्ग का वैभव, देवताओं की सेवा और इंद्रासन की महिमा धीरे-धीरे नहुष के भीतर अहंकार जगाने लगी। उनका तेज इतना बढ़ गया कि वे स्वयं को इंद्र से भी श्रेष्ठ समझने लगे। उन्होंने देवताओं और ऋषियों को अपने सामने तुच्छ मानना शुरू कर दिया। उस समय इंद्र की पत्नी शची अत्यंत सुंदर और पतिव्रता थीं। नहुष ने उन्हें देखकर अपने मन में उन्हें पाने की इच्छा जगा ली। उन्होंने शची को संदेश भेजा कि वह उनके पास आए। शची भयभीत हो गईं और ब्रहस्पति की शरण में पहुँचीं।
देवगुरु ब्रहस्पति ने नहुष की परीक्षा लेने की योजना बनाई। शची ने नहुष से कहा कि वह तभी आएँगी जब वह एक अत्यंत विशेष शर्त पूरी करें। नहुष ने अहंकार में वह शर्त स्वीकार कर ली। शची ने कहा कि वह तभी आएँगी जब नहुष एक ऐसे रथ पर सवार होकर आएँ, जिसे ऋषि और महर्षि स्वयं अपने कंधों पर उठाएँ। नहुष ने इसे अपनी महिमा का प्रमाण मानकर स्वीकार कर लिया।
इस प्रकार ऋषियों को रथ उठाने को विवश किया गया। उन ऋषियों में महर्षि अगस्त्य भी थे, जो छोटे कद के थे। जब उनका कंधा रथ को समान रूप से उठा न सका तो रथ थोड़ा डगमगाया। नहुष ने क्रोध में अगस्त्य से कहा – “तेज़ चलो!” और अपने पैर से उन्हें ठोकर मार दी। यह अपमान अहंकार की पराकाष्ठा था।
महर्षि अगस्त्य ने उसी क्षण नहुष को शाप दे दिया – “तू अपने अहंकार के कारण सर्प बनकर पृथ्वी पर गिरेगा।” उसी क्षण नहुष का तेज लुप्त हो गया और वे आकाश से गिरकर नाग बन गए। उनका इंद्रासन छिन गया, वैभव समाप्त हो गया और वे अपने कर्मों का फल भोगने लगे।
बहुत समय बाद, युधिष्ठिर के समय में, उसी सर्प रूप में नहुष ने पुनः ज्ञान प्राप्त किया और अपने पापों से मुक्त हुए, पर वह कथा आगे चलती है। यह प्रसंग हमें यह सिखाता है कि तप, पद और शक्ति यदि विनम्रता से जुड़ी न हों, तो वही मनुष्य का पतन बन जाती हैं। देवत्व अहंकार से नहीं, संयम से स्थिर रहता है।
स्रोत / संदर्भ
यह कथा महाभारत, वनपर्व और उद्योगपर्व, तथा विष्णु पुराण में राजा नहुष के प्रसंग के रूप में वर्णित है।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
🙏 Support Us / Donate Us
हम सनातन ज्ञान, धर्म–संस्कृति और आध्यात्मिकता को सरल भाषा में लोगों तक पहुँचाने का प्रयास कर रहे हैं। यदि आपको हमारा कार्य उपयोगी लगता है, तो कृपया सेवा हेतु सहयोग करें। आपका प्रत्येक योगदान हमें और बेहतर कंटेंट बनाने की शक्ति देता है।
Donate Now
UPI ID: ssdd@kotak
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें