मकर संक्रांति की पावन संध्या
भारत की सनातन परंपरा में कुछ क्षण ऐसे होते हैं जब समय स्वयं पवित्र हो जाता है — मकर संक्रांति की पूर्वसंध्या ऐसा ही एक क्षण है। 13 जनवरी की संध्या से ही देशभर के मंदिरों, नदियों के घाटों और घरों में तिल, गुड़, खिचड़ी, दीपदान और सूर्य उपासना की तैयारियाँ आरंभ हो जाती हैं। यह केवल एक पर्व की तैयारी नहीं, बल्कि पुराने संस्कारों के विसर्जन और नई चेतना के स्वागत का आध्यात्मिक उत्सव है।
सनातन दर्शन के अनुसार जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, तब उत्तरायण प्रारंभ होता है — अर्थात् प्रकाश का बढ़ना, अंधकार का घटना। यह केवल खगोलीय परिवर्तन नहीं, बल्कि मानव जीवन और पृथ्वी की ऊर्जा में सकारात्मक परिवर्तन का संकेत है। यही कारण है कि इस समय दान, तप, स्नान और उपासना को विशेष फलदायी माना गया है।
तिल और गुड़ केवल मिठाई नहीं हैं — वे कर्म शुद्धि और ऊर्जा संतुलन के प्रतीक हैं। तिल शरीर की नकारात्मकता को बाहर करता है और गुड़ जीवन में मधुरता लाता है। इसलिए सनातन परंपरा कहती है — “तिल-गुड़ घ्या, गोड गोड बोला” — यानी अपने भीतर की कटुता छोड़कर मधुरता ग्रहण करो।
घरों में दीपदान किया जाता है क्योंकि अग्नि और प्रकाश तमस (अज्ञान) के विनाश और सत्व (ज्ञान) के उदय का प्रतीक हैं। मंदिरों में सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, क्योंकि सूर्य केवल एक ग्रह नहीं, बल्कि धरती पर जीवन का मूल स्रोत है।
आज सोशल मीडिया पर भी “उत्तरायण आरंभ”, “सूर्य नमस्कार”, “मकर संक्रांति की शुभकामनाएँ” जैसे मंत्र और संदेश ट्रेंड कर रहे हैं। यह दर्शाता है कि आधुनिक डिजिटल युग में भी सनातन चेतना अपने मूल से जुड़ी हुई है।
मकर संक्रांति की यह संध्या हमें याद दिलाती है कि — जीवन भी एक फसल की तरह है। जब हम पुराने कर्मों की कटाई करते हैं और नए संकल्प बोते हैं तभी भविष्य की हरियाली आती है।
लेखक / Writer : अभिमन्यू 🛞
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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