गरुड़ और विष्णु — जब शक्ति ने समर्पण को चुन लिया
नमस्कार… मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं तुम्हें केवल गरुड़ और विष्णु की कथा नहीं सुनाने जा रहा, बल्कि उस मौन संवाद की अनुभूति कराने जा रहा हूँ जहाँ शक्ति पहली बार समर्पण के आगे नतमस्तक हुई, और ईश्वर ने स्वयं को अपने भक्त की पीठ पर विराजमान होने योग्य समझा। यह कथा केवल पौराणिक घटना नहीं है, यह सनातन धर्म का वह गूढ़ सूत्र है जो बताता है कि बल यदि संयम से जुड़ जाए, तो वह ईश्वरत्व को भी आकर्षित कर लेता है।
जब गरुड़ ने स्वर्ग को कंपा दिया, देवताओं को पराजित किया, इंद्र के वज्र को भी तुच्छ सिद्ध कर दिया और अमृत कलश को अपने पंजों में उठा लिया, तब संपूर्ण ब्रह्मांड जैसे ठहर गया। उस क्षण गरुड़ के सामने विकल्प था। वे चाहें तो अमृत पी सकते थे, चाहें तो अमर हो सकते थे, चाहें तो देवताओं से भी ऊपर उठ सकते थे। पर उसी क्षण गरुड़ ने वह किया, जो उन्हें केवल महाबली नहीं बल्कि महात्मा बनाता है। उन्होंने अमृत को देखा, पर छुआ नहीं। उनके भीतर लालसा नहीं थी, केवल एक ही भाव था—माता की मुक्ति।
यही वह क्षण था जब वैकुण्ठ में विराजमान भगवान विष्णु मुस्कुराए। ईश्वर को शक्ति से कभी भय नहीं होता, पर संयम उन्हें आकर्षित करता है। विष्णु स्वयं गरुड़ के मार्ग में प्रकट हुए। यह कोई साधारण दर्शन नहीं था, यह धर्म द्वारा शक्ति की स्वीकृति थी। विष्णु ने कहा—“वत्स, वर मांगो।”
गरुड़ ने कहा—“प्रभु, पहला वर यह कि मैं बिना अमृत पिए ही अजर–अमर हो जाऊँ।” यह अमरता की नहीं, अनासक्ति की मांग थी। फिर गरुड़ ने दूसरा वर माँगा—“और दूसरा यह कि मेरा स्थान आपसे भी ऊँचा हो।” यह अहंकार नहीं था, यह परीक्षा थी—यह देखने की कि ईश्वर अपने भक्त की गरिमा को कितनी ऊँचाई दे सकता है।
भगवान विष्णु हँसे और बोले—“एवमस्तु।” उन्होंने गरुड़ को अमर कर दिया—अमृत से नहीं, धर्म से। और फिर उन्होंने वह किया जो सनातन की सबसे सुंदर लीला है। उन्होंने गरुड़ को अपने ध्वज पर स्थान दिया। ध्वज सदा भगवान के मस्तक से ऊपर होता है। इस प्रकार गरुड़ भगवान से ऊपर स्थित हुए, पर अहंकार से नहीं, कृतज्ञता से।
यह देखकर गरुड़ की आँखों में आँसू थे। वे समझ गए कि ईश्वर वही है, जो भक्त को स्वयं से ऊपर बैठा दे। भाव-विभोर होकर गरुड़ बोले—“प्रभु, अब आप मुझसे वर मांगिए।” विष्णु ने मुस्कुराकर कहा—“तो सुनो गरुड़, तुम मेरे वाहन बनो।”
यहाँ समझना आवश्यक है—विष्णु ने गरुड़ को दास नहीं बनाया, वाहन बनाया। वाहन वही बनता है जिस पर ईश्वर स्वयं भरोसा करे। इस प्रकार गरुड़ केवल पक्षिराज नहीं बने, वे विष्णु की गति बन गए। जहाँ विष्णु की चेतना थी, वहाँ गरुड़ की उड़ान थी।
इस संबंध में महर्षि कश्यप का तप बोलता है। उनके पुत्र गरुड़ ने सिद्ध कर दिया कि पिता का तप केवल संतान को जन्म नहीं देता, वह उसे धर्म का वाहक भी बनाता है। विनता की सेवा और कश्यप का संयम—दोनों गरुड़ में एक साथ प्रवाहित हुए।
इसी गरुड़ की जिज्ञासा और धर्मबोध के कारण भगवान विष्णु ने उन्हें जीवन, मृत्यु, कर्म और मोक्ष के रहस्य बताए, जो आगे चलकर गरुड़ पुराण के रूप में प्रसिद्ध हुए। यह ग्रंथ केवल मृत्यु के बाद का नहीं, बल्कि जीवन को धर्ममय बनाने का उपदेश है।
यह कथा हमें सिखाती है कि शक्ति यदि केवल जीतना चाहती है, तो वह राक्षसी बन जाती है। पर शक्ति यदि किसी को मुक्त करना चाहती है, तो वह गरुड़ बन जाती है। और ईश्वर उसी शक्ति के साथ चलता है, जो स्वयं को बाँधने की क्षमता रखती है।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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