क्या ईश्वर और अल्लाह एक ही हैं? सनातन और इस्लाम का तार्किक, दार्शनिक और वैज्ञानिक विश्लेषण
कल इसी विषय पर एक प्रश्न सोशल मीडिया पर पूछा गया था — “क्या अल्लाह और भगवान एक ही हैं?” उत्तर बहुत आए, लेकिन अधिकतर भावनात्मक थे, तार्किक नहीं। कई लोगों ने सनातन धर्म के सिद्धांतों को इस्लामी अवधारणाओं से जोड़ने का प्रयास किया, जबकि दोनों परंपराओं की मूल संरचना, दर्शन और ईश्वर-परिभाषा एक-दूसरे से मूलतः भिन्न हैं।
तो आइए, किसी को ठेस पहुँचाए बिना, तथ्य, दर्शन और तर्क के आधार पर समझते हैं कि क्या ईश्वर और अल्लाह वास्तव में एक हो सकते हैं या नहीं। यहाँ पाँच स्पष्ट बिंदु रखे जा रहे हैं, जिन्हें पढ़कर आप स्वयं निर्णय कर सकते हैं।
1. ईश्वर की परिभाषा और पूजा की स्वतंत्रता
इस्लाम में केवल एक अल्लाह की अवधारणा है। वह निराकार है और उसकी किसी भी प्रकार की मूर्ति या प्रतीकात्मक रूप में पूजा करना वर्जित माना जाता है। पूजा की विधियाँ सीमित और निर्धारित हैं।
सनातन धर्म में ईश्वर को निराकार ब्रह्म, साकार देवता और चेतना के रूप में तीनों स्तरों पर समझा और पूजा जाता है। यहाँ किसी भी रूप में उपासना पर प्रतिबंध नहीं है, क्योंकि लक्ष्य बाहरी रूप नहीं बल्कि आंतरिक अनुभूति है। यही कारण है कि सनातन में विविधता है, जबकि इस्लाम में एकरूपता।
2. ईश्वर का स्थान
इस्लाम में परंपरागत मान्यता के अनुसार अल्लाह सातवें आसमान के ऊपर स्थित है, इसी कारण उसे ऊपरवाला कहा जाता है।
सनातन दर्शन कहता है कि ईश्वर न ऊपर है न नीचे, वह कण-कण में व्याप्त है। ईशोपनिषद का वाक्य कहता है कि यह सम्पूर्ण जगत ईश्वर से आच्छादित है। आधुनिक विज्ञान भी ऊर्जा को सर्वव्यापी मानता है।
3. पुनर्जन्म बनाम एकमात्र जीवन
इस्लाम में एक ही जीवन और एक ही मृत्यु की अवधारणा है। इसके बाद न्याय का दिन और फिर स्वर्ग या नरक।
सनातन धर्म में आत्मा अमर मानी जाती है। शरीर बदलता है, चेतना नहीं। यह सिद्धांत ऊर्जा संरक्षण के नियम से मेल खाता है, जहाँ ऊर्जा नष्ट नहीं होती, केवल रूप बदलती है। इसी को पुनर्जन्म कहा गया है।
4. न्याय का सिद्धांत
इस्लाम में अंतिम निर्णय ईश्वर करता है कि कौन स्वर्ग जाएगा और कौन नरक।
सनातन धर्म में कोई ईश्वर बैठकर फैसला नहीं करता। यहाँ कर्म ही न्यायाधीश है। जैसा कर्म, वैसा फल। उत्तरदायित्व व्यक्ति के अपने कर्मों पर होता है, किसी बाहरी सत्ता पर नहीं।
5. स्वीकार्यता और समावेशिता
इस्लाम में गैर-मुस्लिम और काफिर जैसे वर्गीकरण मौजूद हैं।
सनातन धर्म में गैर-सनातन जैसा कोई शब्द शास्त्रों में नहीं मिलता। यह परंपरा मनुष्य ही नहीं, पशु, पक्षी, वृक्ष, नदी और पृथ्वी तक को पूजनीय मानती है। इसका मूल मंत्र है कि सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है।
सनातन धर्म खोज की परंपरा
सनातन धर्म केवल विश्वास पर आधारित नहीं है। यह प्रश्न, खोज और अनुभव की परंपरा है। ऋषियों ने यह नहीं कहा कि सब कुछ ईश्वर ने बना दिया, बल्कि पूछा कि सृष्टि कैसे बनी, क्यों बनी और कैसे कार्य करती है। इसी कारण इस परंपरा से वैज्ञानिक दृष्टि वाले ऋषि उत्पन्न हुए और वेदों को ज्ञान का स्रोत माना गया।
निष्कर्ष
शब्द के स्तर पर ईश्वर और अल्लाह एक नहीं हैं। परिभाषा, दर्शन और वैज्ञानिक दृष्टि से भी दोनों अवधारणाएँ भिन्न हैं। अलग-अलग परंपराओं का सम्मान आवश्यक है, लेकिन भिन्न अवधारणाओं को जबरदस्ती एक कहना भी सत्य नहीं है।
यह लेख किसी मत या समुदाय को ठेस पहुँचाने के लिए नहीं, बल्कि तर्क, अध्ययन और सत्य को सामने रखने के उद्देश्य से लिखा गया है। अध्ययन करें, शोध करें और फिर निष्कर्ष निकालें।
जय श्री राम
लेखक / Writer : अभिमन्यू 🛞
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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