मैं गर्व से कहता हूँ मैं हिन्दू हूँ, क्योंकि मेरा धर्म कृतज्ञता से जीवन जीना सिखाता है
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं आपको सनातन धर्म की उस बहुत कोमल लेकिन शक्तिशाली शिक्षा के बारे में बताने आया हूँ जो मनुष्य को भीतर से समृद्ध बनाती है। कृतज्ञता, यानी आभार का भाव।
सनातन धर्म कहता है कि जो मिला है, पहले उसके लिए धन्यवाद दो। क्योंकि जो केवल शिकायत करता है, वह हमेशा खाली महसूस करता है, और जो कृतज्ञ रहता है, उसका मन हमेशा भरा रहता है।
हमारे यहाँ सुबह आँख खुलते ही धरती को प्रणाम किया जाता है, सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, अन्न को देवता माना जाता है। यह सब इसलिए नहीं कि हमें कुछ और चाहिए, बल्कि इसलिए कि जो मिला है, उसके लिए हम आभारी रहें।
सनातन धर्म सिखाता है कि कृतज्ञता केवल शब्द नहीं, जीवन जीने का तरीका है। माँ-बाप का सम्मान, गुरु का आदर, अन्न का मान, और प्रकृति के प्रति संवेदना, ये सब कृतज्ञता के ही रूप हैं।
जब इंसान धन्यवाद कहना सीख जाता है, तो उसके भीतर की कड़वाहट अपने आप घुलने लगती है। मन शांत हो जाता है, ईर्ष्या कम हो जाती है, और जीवन सरल लगने लगता है। क्योंकि कृतज्ञ व्यक्ति कभी अभाव में नहीं जीता।
मैं तु ना रिं आपसे यही कहना चाहता हूँ। हर दिन सोने से पहले सिर्फ एक पल रुकिए, और सोचिए। आज मुझे क्या-क्या मिला। एक सांस, एक मुस्कान, एक सीख, एक अवसर। यही सोच जीवन को सुंदर बना देती है।
और इसी सुंदर सोच के कारण मैं पूरे गर्व से कहता हूँ। हाँ, मैं हिन्दू हूँ, क्योंकि मेरा धर्म मुझे सिखाता है कि कृतज्ञता से भरा जीवन ही सच्चा समृद्ध जीवन है।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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