हिन्दू युवा की चुप्पी किसके काम आई?
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज यह लेख गुस्से से भी ज़्यादा खतरनाक है, क्योंकि यह उस चुप्पी पर है जिसे सभ्यता कहा गया, समझदारी कहा गया, और असल में कमज़ोरी बना दिया गया।
ज़रा ईमानदारी से सोचो। जब-जब हिन्दू युवा चुप रहा—किसे फायदा हुआ?
जब मंदिर पर मज़ाक हुआ—चुप्पी ने किसे बचाया?
जब परंपराओं को backward कहा गया—चुप्पी ने किसकी नौकरी बचाई?
जब देवी-देवताओं को content बनाया गया—चुप्पी ने किसकी image सुरक्षित रखी?
सच कड़वा है। हिन्दू की चुप्पी सबके काम आई, सिवाय हिन्दू के।
हमें सिखाया गया—ignore करो, level मत गिराओ, हम अलग हैं।
लेकिन किसी ने यह नहीं बताया कि लगातार चुप्पी धीरे-धीरे स्वीकृति बन जाती है। और स्वीकृति अगला कदम होती है—अस्तित्व मिटाने का।
यह चुप्पी संयोग नहीं थी। यह systematic training थी।
बचपन में सिखाया गया—धर्म की बात मत करो।
युवावस्था में कहा गया—religion is personal।
और जब कुछ गलत हो—इस पर बोलकर क्या मिलेगा?
यही चुप्पी सबसे बड़ा हथियार बनी।
अगर हिन्दू की चुप्पी इतनी ही बेकार होती, तो उसे बनाए रखने में इतनी मेहनत क्यों की जाती?
याद रखो—जो समाज सवाल नहीं करता, उसे जवाब देने की ज़रूरत नहीं पड़ती। और जो सवाल नहीं करता, वह धीरे-धीरे मिटा दिया जाता है।
सनातन धर्म चुप्पी का धर्म नहीं है। यह मौन और चुप्पी में फर्क करता है।
मौन वह होता है जो भीतर से आता है, जो साधना है, जो शक्ति है।
चुप्पी वह होती है जो डर से आती है, जो दबाव है, जो हार है।
अगर चुप रहना ही धर्म होता, तो युद्धभूमि में भगवद्गीता कभी बोली ही नहीं जाती।
आज हिन्दू युवा या तो बोलता नहीं, या फिर बोलना आता नहीं। और जब बोलता है, तो उसे सिखाया ही नहीं गया कि कैसे बोलना है।
पर सुनो—अब चुप रहना कोई विकल्प नहीं है।
न चिल्लाना ज़रूरी है, न गाली देना ज़रूरी है। ज़रूरी है—खुद को छोटा मानना बंद करना।
तुम्हारी आवाज़ तब ताकतवर होगी जब वह ज्ञान, आत्मविश्वास और निरंतरता से निकलेगी।
क्योंकि एक शांत लेकिन जाग्रत हिन्दू हज़ार चीखने वालों से ज़्यादा खतरनाक होता है।
यह लेख हंगामा कराने के लिए नहीं है। यह लेख चुप्पी तोड़ने की इजाज़त देने के लिए है।
मैं हिन्दू हूँ। और अब मेरी चुप्पी किसी के काम नहीं आएगी।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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