गजेंद्र मोक्ष — शरणागति की वह पुकार जिसने बंधन तोड़ दिए
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं तुम्हें उस कथा का स्मरण कराना चाहता हूँ जहाँ न विद्या काम आई, न बल, न राज्य—केवल एक क्षण की निष्कपट शरणागति ने बंधन तोड़ दिए। यह कथा है गजेंद्र मोक्ष की, जहाँ पीड़ा की चरम सीमा पर पहुँचा एक जीव प्रभु को पुकारता है, और प्रभु उसी क्षण उसे अपने हाथों से उठाते हैं।
बहुत प्राचीन समय में गजेंद्र नाम का एक महान हाथी था, जो अपने दल के साथ सरोवरों और वनों में विचरण करता था। वह बलवान था, अभिमानी नहीं, पर अपने सामर्थ्य पर निश्चिंत अवश्य था। एक दिन वह अपने परिवार सहित एक सुंदर सरोवर में उतरा। जल शीतल था, कमल खिले थे। तभी जल के भीतर छिपा एक शक्तिशाली ग्राह उसके पैर से लिपट गया।
गजेंद्र ने पूरी शक्ति लगाई। दल के हाथियों ने खींचा, वर्षों तक संघर्ष चला, पर बंधन ढीला न पड़ा। समय के साथ उसका बल क्षीण होता गया, श्वास भारी होने लगी, और वह समझ गया कि यह संघर्ष केवल बाहुबल से नहीं सुलझेगा।
उसी क्षण स्मृति जागी—पूर्वजन्म का संस्कार। गजेंद्र ने अपनी सूँड से एक कमल उठाया और आकाश की ओर मुख करके पुकारा। उसने कोई लंबा मंत्र नहीं पढ़ा, केवल हृदय की पुकार उठी—हे नारायण।
यह नाम निकलते ही दिशाएँ जैसे थम गईं। क्षणभर में भगवान विष्णु गरुड़ पर आरूढ़ होकर प्रकट हुए। उनके हाथ में सुदर्शन था और दृष्टि करुणा से भरी हुई थी। उन्होंने एक ही क्षण में ग्राह का अंत किया और गजेंद्र को जल से बाहर उठाया—अपने हाथों से।
गजेंद्र मुक्त हुआ, पर उससे भी बड़ा वर उसे मिला—मोक्ष। प्रभु ने कहा कि जिसने संकट में सबसे पहले मुझे पुकारा, उसने ही सही शरण पाई। यहाँ न वंश देखा गया, न योग्यता, न विधि—केवल समर्पण। गजेंद्र का अहंकार नहीं, उसकी विवशता ही उसकी पूँजी बनी।
यह कथा हमें यह सिखाती है कि जीवन के ग्राह कभी-कभी इतने दृढ़ होते हैं कि हमारी सारी योजनाएँ थक जाती हैं। तब उपाय बदलना पड़ता है—हृदय को मोड़ना पड़ता है। जब कमल-सा मन प्रभु की ओर उठता है, तब बंधन अपने आप ढीले पड़ जाते हैं।
मोक्ष केवल अंत नहीं, वह भय से मुक्ति भी है। और वह मुक्ति उसी क्षण मिलती है, जब हम स्वयं को सौंप देते हैं।
स्रोत / संदर्भ: यह कथा श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टम स्कंध में गजेंद्र मोक्ष के रूप में विस्तृत वर्णित है।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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