महर्षि अंगिरा की सम्पूर्ण कथा
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं तुम्हें उस महामहर्षि की कथा सुनाने आया हूँ जिनकी साधना अग्नि के समान प्रखर थी, जिनकी वाणी वेदों की ज्वाला बनकर अज्ञान को भस्म करती थी, और जिनका जीवन यह सिखाता है कि प्रकाश बाहर नहीं, भीतर जलाया जाता है। आज मैं तुम्हें महर्षि अंगिरा की सम्पूर्ण कथा सुनाता हूँ, जन्म से लेकर देहावसान तक, एक ही प्रवाह में।
महर्षि अंगिरा का जन्म वैदिक युग की उस पावन परम्परा में हुआ जहाँ अग्नि केवल यज्ञ की लौ नहीं, चेतना की प्रतीक थी। कहा जाता है कि वे ब्रह्मा की मानस संतति परम्परा से सम्बद्ध थे और जन्म लेते ही उनके भीतर तप की ऐसी ऊष्मा थी जो शब्दों में नहीं, अनुभव में उतरती थी। बाल्यकाल से ही उनका मन स्थिर और दृष्टि दीप्त थी। वे खेल में नहीं, अग्नि के स्वभाव को देखने में रमे रहते। यही बोध आगे चलकर उनके जीवन का सूत्र बना, अज्ञान का दहन और ज्ञान का उदय।
युवा अवस्था में उन्होंने वेदों का गहन अध्ययन किया, पर उनका आकर्षण केवल पाठ में नहीं, प्रयोग में था। वे अग्निहोत्र करते, यज्ञ की विधि में सूक्ष्म परिवर्तन कर प्रभाव को देखते, और शिष्यों को समझाते कि मंत्र का अर्थ उच्चारण में नहीं, भाव और अनुशासन में बसता है। अंगिरा के आश्रम में अग्नि सदा प्रज्वलित रहती, एक शांत लौ, जो साधकों को स्मरण कराती कि भीतर की अग्नि भी ऐसी ही होनी चाहिए। उनके लिए तप शरीर को कष्ट देना नहीं, चेतना को शुद्ध करना था।
अंगिरा का गृहस्थ जीवन भी साधना का विस्तार था। उन्होंने सिखाया कि यज्ञ और जीवन एक दूसरे के विरोधी नहीं हैं। परिवार, समाज और साधना, तीनों का समन्वय उनके आचरण में दिखाई देता था। उनके शिष्य राजकुमार भी होते थे और वनवासी भी, पर आश्रम में भेद नहीं था। जो आता, उसे पहले शील सिखाया जाता, फिर शास्त्र। अंगिरा की वाणी में कठोरता नहीं, स्पष्टता थी।
वेदों में अंगिरा का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऋग्वेद के अनेक सूक्तों में उनकी वाणी अग्नि के स्तवन के रूप में प्रकट होती है, जहाँ अग्नि देव नहीं, देवत्व तक पहुँचने का सेतु है। अंगिरा ने यज्ञ को कर्मकांड से ऊपर उठाकर नैतिकता से जोड़ा। वे कहते थे कि यदि यज्ञ के साथ सत्य, दया और संयम न हों, तो अग्नि केवल ईंधन खाती है, अज्ञान नहीं।
कथाएँ बताती हैं कि अंगिरा का तप इतना प्रखर था कि असुर वृत्तियाँ स्वयं शांत हो जाती थीं। वे शाप देने से बचते, चेतावनी देते, अवसर देते और अंततः प्रकृति को निर्णय करने देते। उनका विश्वास था कि समय सबसे बड़ा न्यायाधीश है और सत्य उसका सहयोगी। इसी कारण उनके शिष्य केवल कर्मकांड के ज्ञाता नहीं, चरित्र के धनी बने।
अंतिम काल में अंगिरा अधिक अंतर्मुखी हो गए। आश्रम चलता रहा, यज्ञ होते रहे, पर उनकी दृष्टि भीतर की लौ पर टिक गई। एक संध्या उन्होंने अग्निहोत्र के बाद मौन साधना की। रात्रि गहरी हुई, पर अग्नि की लौ शांत रही। प्रभात तक वह लौ भीतर समा गई और अंगिरा देह सीमा से परे ब्रह्म तेज में विलीन हो गए।
महर्षि अंगिरा का संदेश सरल और शाश्वत है। अग्नि बाहर जलाओ या भीतर, उद्देश्य एक ही हो, अज्ञान का दहन और करुणा का प्रकाश। जो अपने भीतर की लौ को संयम, सत्य और सेवा से पोषित करता है, वही समाज का दीप बनता है।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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