धर्म बिना विवेक अधूरा है
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं उस सूक्ष्म सत्य की ओर संकेत करना चाहता हूँ जिसे समझे बिना धर्म सरल से जटिल, पवित्र से कट्टर और जीवनदायी से विनाशकारी बन सकता है। धर्म बिना विवेक अधूरा है। धर्म यदि दिशा है, तो विवेक उसका दीपक है। दिशा बिना दीपक के अंधेरे में भटकाती है, और दीपक बिना दिशा के केवल प्रकाश बनकर रह जाता है। सनातन धर्म की पूर्णता इन्हीं दोनों के संतुलन में है।
विवेक का अर्थ है सही और गलत के बीच भेद करने की क्षमता। यह क्षमता केवल बुद्धि से नहीं आती, यह जागरूक चेतना से आती है। विवेक पूछता है कि कब, कहाँ, कैसे और किसके लिए कोई कर्म किया जा रहा है। धर्म यदि केवल नियम बन जाए और विवेक उसमें न हो, तो वही धर्म कठोरता बन जाता है। नियम तब तक ही धर्म हैं, जब तक वे जीवन की रक्षा करें। जब वे जीवन को कुचलने लगें, तब वे धर्म नहीं रहते, वे अधर्म का रूप ले लेते हैं।
इतिहास गवाह है कि जब जब धर्म से विवेक अलग हुआ, तब तब हिंसा पैदा हुई। लोग ईश्वर के नाम पर क्रूर हो गए, सत्य के नाम पर असत्य करने लगे, और धर्म के नाम पर अधर्म फैलने लगा। इसका कारण धर्म नहीं था, कारण विवेक का अभाव था। क्योंकि विवेक ही वह शक्ति है जो धर्म को समय, परिस्थिति और मानवता के साथ जोड़कर रखती है।
सनातन परंपरा में धर्म को कभी स्थिर नियमों की सूची नहीं माना गया। यहाँ धर्म को ऋत कहा गया। वह जीवंत व्यवस्था जो समय और परिस्थिति के अनुसार अपना रूप बदलती है, पर अपना मूल नहीं छोड़ती। और इस परिवर्तनशीलता को समझने की शक्ति विवेक ही देता है। जो विवेकशील है, वही जानता है कि कब कठोर होना है और कब कोमल, कब मौन उचित है और कब प्रतिकार, कब नियम पालन धर्म है और कब नियम तोड़ना ही धर्म बन जाता है।
विवेक के बिना भक्ति अंधी हो जाती है। वह प्रश्न करना छोड़ देती है और केवल अनुकरण करने लगती है। विवेक के बिना ज्ञान अहंकार बन जाता है। विवेक के बिना कर्म स्वार्थ से दूषित हो जाता है। विवेक ही वह तत्व है जो हर मार्ग को शुद्ध करता है। इसलिए गीता में कर्म से पहले विवेक की बात कही गई, भक्ति के साथ ज्ञान जोड़ा गया, और धर्म को बुद्धियोग से संयुक्त किया गया।
विवेक मनुष्य को यह सिखाता है कि धर्म दूसरों को परखने का औज़ार नहीं, स्वयं को साधने का माध्यम है। जो व्यक्ति विवेकशील होता है, वह पहले अपने आचरण को देखता है, दूसरों के दोष बाद में। वह जानता है कि धर्म का उद्देश्य श्रेष्ठ कहलाना नहीं, श्रेष्ठ होना है। और श्रेष्ठता का माप बाहरी आडंबर नहीं, आंतरिक शुद्धता है।
विवेक हमें यह भी सिखाता है कि करुणा और न्याय एक दूसरे के विरोधी नहीं हैं। बिना विवेक की करुणा अधर्म को बढ़ावा दे सकती है, और बिना विवेक का न्याय निर्दय बन सकता है। विवेक दोनों के बीच संतुलन बनाता है। वही तय करता है कि कब क्षमा उचित है और कब कठोर निर्णय आवश्यक। यही संतुलन सनातन धर्म की पहचान है।
धर्म यदि नदी है, तो विवेक उसका तट है। तट के बिना नदी बाढ़ बन जाती है, और नदी के बिना तट सूखा रहता है। विवेक धर्म को बहने देता है, पर विनाशकारी नहीं बनने देता। यही कारण है कि सनातन धर्म ने प्रश्न करने की परंपरा को कभी रोका नहीं। उपनिषद संवाद हैं, प्रश्नोत्तर हैं। वहाँ गुरु भी प्रश्नों से नहीं डरता।
आज के समय में धर्म का सबसे बड़ा संकट यही है कि विवेक को त्याग दिया गया है। लोग यह नहीं पूछते कि यह क्यों किया जा रहा है, वे केवल यह देखते हैं कि कौन कर रहा है। जब विवेक समाप्त होता है, तब भीड़ जन्म लेती है। और भीड़ कभी धर्म नहीं जीती, वह केवल प्रतिक्रिया करती है।
विवेक के साथ जिया गया धर्म मनुष्य को कठोर नहीं, करुणामय बनाता है। डरपोक नहीं, साहसी बनाता है। अंधभक्त नहीं, सजग साधक बनाता है। ऐसा धर्म किसी को बाँटता नहीं, जोड़ता है।
अंततः धर्म का उद्देश्य नियमों का पालन नहीं, चेतना का विस्तार है। और चेतना बिना विवेक के विस्तार नहीं पाती। इसलिए सनातन दृष्टि स्पष्ट है।
धर्म बिना विवेक अधूरा है। विवेक उसे जीवन देता है, विवेक उसे मानवीय बनाता है, और विवेक ही उसे सत्य के मार्ग पर स्थिर रखता है।
जो विवेक के साथ धर्म जीता है, वह किसी मत का अनुयायी नहीं रह जाता, वह स्वयं धर्म का उदाहरण बन जाता है।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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