सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

महर्षि दधीचि की सम्पूर्ण कथा: त्याग, तपस्या और धर्म की रक्षा के लिए अस्थि दान का महायज्ञ

Blog Post Title

महर्षि दधीचि की अमर कथा

Maharishi Dadhichi sitting in calm meditation, radiating golden light as he prepares for his final sacrifice for the welfare of the world

नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।

आज मैं तुम्हें उस ऋषि की कथा सुनाने आया हूँ जिनकी कठोर तपस्या ने स्वयं यमराज को भी विचलित कर दिया, जिनकी करुणा ने संसार को दया का अर्थ सिखाया और जिनके शरीर का एक एक कण धर्म की रक्षा के लिए अर्पित हुआ आज मैं तुम्हें महर्षि दधीचि की सम्पूर्ण अविच्छिन्न और गहन कथा सुनाने आया हूँ।

महर्षि दधीचि का जन्म वैदिक काल में हुआ पर उनका जीवन साधारण नहीं था। वे ऋषि अथर्वा के वंश से उत्पन्न माने जाते हैं और जन्म से ही उनमें एक असामान्य तेज और त्याग की भावना विद्यमान थी। बचपन से ही वे अपने शरीर को नहीं अपने धर्म को महत्व देते थे। जब अन्य बच्चे खेलते तब दधीचि ध्यान में बैठते। जब युवा भोग की ओर आकर्षित होते तब वे तप की ओर बढ़ते। उनका मन इतना शांत और स्थिर था कि वे दर्द को भी साक्षी की तरह देखते थे न उसे अपनाते न उससे भागते।

उनकी तपस्या इतनी गहन थी कि देवता भी उनसे भय और श्रद्धा दोनों रखते थे। वे वर्षों तक एक ही आसन में बैठकर प्राणों को नियंत्रित करते कभी जल में कभी अग्नि के समीप कभी खुले आकाश के नीचे। उनका शरीर साधना से कठोर हो चुका था पर हृदय अत्यंत कोमल था। कोई भी दुखी प्राणी उनके पास आता वे उसे केवल दया नहीं देते समाधान भी देते। उनकी वाणी में ऐसी शांति थी कि राक्षस भी सिर झुका देते थे।

एक समय देवताओं और असुरों के बीच भयानक युद्ध छिड़ा। असुरों का राजा वृत्रासुर इतना शक्तिशाली हो गया था कि उसे कोई भी देव अस्त्र मार नहीं सकता था। देवता भयभीत होकर ब्रह्मा के पास पहुँचे। ब्रह्मा ने बताया कि वृत्रासुर का अंत केवल उस वज्र से होगा जो किसी पूर्ण तपस्वी की अस्थियों से बनेगा। यह सुनकर देवता स्तब्ध रह गए क्योंकि ऐसा तपस्वी केवल एक ही था महर्षि दधीचि।

इंद्र और अन्य देवता दधीचि के आश्रम पहुँचे। उन्होंने सारी बात कही कि संसार संकट में है कि धर्म पर अंधकार छा रहा है और कि केवल उनके शरीर की अस्थियों से बना वज्र ही इस संकट को समाप्त कर सकता है। यह सुनकर देवताओं की आँखें झुक गईं क्योंकि वे जानते थे कि वे दधीचि से उनका जीवन माँग रहे हैं।

महर्षि दधीचि मुस्कुराए। न कोई भय न कोई संकोच। उन्होंने पूछा यदि मेरे शरीर से बने अस्त्र से धर्म की रक्षा होगी तो इसमें हानि क्या है। उन्होंने बिना किसी शर्त के अपने शरीर का त्याग स्वीकार कर लिया। उन्होंने देवताओं से कहा कि वे पहले अपने शरीर को पवित्र करने के लिए उन्हें गंगाजल दें फिर वे योग के द्वारा प्राण त्याग देंगे।

दधीचि ध्यान में बैठे। उनका श्वास धीरे धीरे स्थिर हुआ मन शांत हो गया और चेतना ब्रह्म में विलीन होने लगी। कुछ ही क्षणों में उन्होंने देह त्याग दिया। उनके शरीर से अस्थियाँ निकाली गईं और उनसे वज्र बनाया गया। उसी वज्र से इंद्र ने वृत्रासुर का वध किया और संसार पुनः धर्म के मार्ग पर लौटा।

पर महर्षि दधीचि की कथा यहाँ समाप्त नहीं होती। उनका त्याग केवल युद्ध जीतने का साधन नहीं था। वह मनुष्य को यह सिखाने आया था कि शरीर नश्वर है पर धर्म अमर है। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि सच्चा ऋषि वह है जो अपने प्राणों से अधिक सत्य को महत्व देता है।

दधीचि का जीवन सरल था। वे वैभव में नहीं व्रत में जीते थे। उन्होंने कभी किसी से कुछ नहीं माँगा पर संसार ने उनसे सब कुछ पाया। उनके आश्रम में कोई भूखा नहीं लौटता था कोई अपमानित नहीं होता था। उनका स्वभाव इतना निर्मल था कि उनके पास बैठकर मनुष्य स्वयं को पवित्र अनुभव करता था।

कहा जाता है कि दधीचि का तेज आज भी उन स्थलों पर अनुभव किया जा सकता है जहाँ उन्होंने तप किया था। उनका त्याग केवल इतिहास नहीं वह चेतना है जो हर उस मनुष्य में जाग सकती है जो अपने सुख से अधिक अपने धर्म को महत्व देता है।

महर्षि दधीचि हमें यह सिखाते हैं कि जब समय अंधकारमय हो तब सबसे बड़ा प्रकाश स्वयं का त्याग होता है। जो अपने लिए जीता है वह मिट जाता है। जो धर्म के लिए जीता है वह अमर हो जाता है।

लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद


🙏 Support Us / Donate Us

हम सनातन ज्ञान, धर्म–संस्कृति और आध्यात्मिकता को सरल भाषा में लोगों तक पहुँचाने का प्रयास कर रहे हैं। यदि आपको हमारा कार्य उपयोगी लगता है, तो कृपया सेवा हेतु सहयोग करें। आपका प्रत्येक योगदान हमें और बेहतर कंटेंट बनाने की शक्ति देता है।

Donate Now
UPI ID: ssdd@kotak



टिप्पणियाँ