संतुलन ही धर्म है न अति भोग न अति तप
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं उस सनातन सत्य को शब्द देने आया हूँ जिसे ऋषियों ने जीवन के अनुभव से जाना और शास्त्रों ने मौन में स्वीकार किया संतुलन ही धर्म है न अति भोग न अति तप। यही वह मध्य मार्ग है जिस पर चलकर मनुष्य न गिरता है न टूटता है न भटकता है बल्कि धीरे धीरे भीतर से स्थिर शांत और परिपक्व होता चला जाता है।
मनुष्य की प्रवृत्ति हमेशा अति की ओर झुकती है। जब उसे सुख मिलता है तो वह उसमें डूब जाना चाहता है। जब उसे पीड़ा मिलती है तो वह उससे भागना चाहता है। इसी अति में जीवन का संतुलन खो जाता है। अति भोग शरीर को खोखला कर देता है और मन को बेचैन। अति तप शरीर को तोड़ देता है और मन को कठोर। दोनों ही स्थितियों में आत्मा दब जाती है। सनातन दृष्टि ने इसीलिए न भोग को त्यागने को कहा न तप को महिमामंडित किया उसने संतुलन को चुना।
भोग का उद्देश्य जीवन का रस लेना है और तप का उद्देश्य जीवन को शुद्ध करना है। जब भोग बिना विवेक के होता है तब वह आसक्ति बन जाता है। जब तप बिना करुणा के होता है तब वह आत्मपीड़ा बन जाता है। संतुलन दोनों को सही स्थान पर रखता है। वह भोग को आवश्यक बनाता है पर अत्यधिक नहीं वह तप को उपयोगी बनाता है पर कठोर नहीं। यही संतुलन मनुष्य को भीतर से स्वस्थ रखता है।
सनातन धर्म ने गृहस्थ को भी उतना ही पवित्र माना जितना संन्यासी को। यह अपने आप में संतुलन का सबसे बड़ा प्रमाण है। यहाँ जीवन से भागना भी नहीं सिखाया गया और जीवन में डूब जाना भी नहीं। यहाँ कहा गया जीवन में रहो पर जीवन के दास मत बनो। यही संतुलन है।
जब मनुष्य केवल भोग में जीता है तब उसकी चेतना नीचे की ओर जाती है इंद्रियों की ओर लालसाओं की ओर। जब मनुष्य केवल तप में जीता है तब उसकी चेतना ऊपर तो जाती है पर जड़ हो जाती है कठोर हो जाती है। संतुलन चेतना को केंद्र में रखता है जहाँ विवेक करुणा और शांति एक साथ रहते हैं। यही केंद्र सनातन धर्म का हृदय है।
संतुलन जीवन की हर परत में आवश्यक है खाने में बोलने में कमाने में खर्च करने में प्रेम करने में त्याग करने में। जो व्यक्ति संतुलन में रहता है वह न तो अपनी इंद्रियों का गुलाम होता है न अपनी कठोर धारणाओं का कैदी। वह परिस्थितियों के अनुसार झुक सकता है पर टूटता नहीं। यही लचीलापन उसे जीवित रखता है।
संतुलन का अर्थ उदासीनता नहीं है। यह सजगता है। यह जानना कि कब रुकना है और कब आगे बढ़ना है। यह समझना कि कब त्याग आवश्यक है और कब स्वीकार। यही समझ धर्म को व्यवहारिक बनाती है। जब धर्म व्यवहारिक होता है तभी वह जीवन में टिकता है।
अति भोग मनुष्य को पशुता की ओर ले जाता है अति तप उसे कठोरता की ओर। संतुलन उसे मानवता में स्थिर करता है। और मानवता ही धर्म का आधार है। जहाँ मानवता है वहीं करुणा है और जहाँ करुणा है वहीं ईश्वर का निवास है।
इसलिए सनातन परंपरा ने न तो जीवन का रस छीनने को कहा न ही जीवन को अनियंत्रित छोड़ने को। उसने केवल इतना कहा जागरूक होकर जियो। यह जागरूकता ही संतुलन है।
अंततः यही सत्य है कि जो अति में जाता है वह टूटता है। जो संतुलन में रहता है वही फलता है।
संतुलन ही धर्म है न अति भोग न अति तप। जो इसे समझ लेता है उसके लिए जीवन बोझ नहीं रहता और जो इसे जी लेता है उसके लिए जीवन स्वयं साधना बन जाता है।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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