महर्षि मरीचि की अखंड कथा
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं तुम्हें उस ऋषि की कथा सुनाने आया हूँ जिनकी दृष्टि आकाश से भी विस्तृत थी, जिनके शब्दों में वेदों की गूँज थी, और जिनके वंश से ऐसे महापुरुष उत्पन्न हुए जिन्होंने धर्म, विज्ञान और नीति को एक साथ दिशा दी आज मैं तुम्हें महर्षि मरीचि की सम्पूर्ण अखंड और गहन कथा सुनाता हूँ।
महर्षि मरीचि का जन्म ब्रह्मा की मानस संतति परंपरा में हुआ। वे उन दिव्य ऋषियों में से थे जो विचार से उत्पन्न हुए थे न कि गर्भ से। जब ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना का संकल्प किया तब जिन चेतनाओं को उन्होंने अपने मन से उत्पन्न किया उनमें मरीचि का स्थान अत्यंत उज्ज्वल था। उनका नाम मरीचि स्वयं प्रकाश का सूचक है एक ऐसी किरण जो अंधकार को चीरती हुई सत्य को प्रकट करती है। जन्म से ही उनमें ऐसा तेज था कि वे जहाँ बैठते वहाँ का वातावरण पवित्र और स्थिर हो जाता।
बाल्यकाल से ही मरीचि का मन गहन चिंतन में रमा रहता था। वे आकाश को देखते और पूछते यह विशालता किस नियम से चल रही है वायु क्यों बहती है समय किसके अधीन है। इन प्रश्नों ने उन्हें तप की ओर मोड़ा। उन्होंने हिमालय की एकांत गुफाओं में वर्षों तक साधना की। उनका तप बाहरी कष्ट का नहीं आंतरिक विस्तार का था। वे ध्यान में बैठते और अपनी चेतना को आकाश के समान विस्तृत करते जहाँ सीमाएँ विलीन हो जातीं। इसी साधना से वे ब्रह्म के नियमों को समझने लगे कि सृष्टि अनुशासन से चलती है और हर वस्तु अपने कर्म से बंधी है।
महर्षि मरीचि केवल ध्यानस्थ ऋषि नहीं थे वे सृष्टि शिल्पी भी थे। उनके पुत्र थे महर्षि कश्यप जिनसे देव दानव नाग पक्षी और मानव जातियाँ उत्पन्न हुईं। इस प्रकार मरीचि स्वयं सृष्टि की विविधता के मूल में हैं। पर वे कभी अपने वंश पर गर्व नहीं करते थे। वे कहते थे कि जो जन्म देता है उसका धर्म केवल पालन करना होता है अधिकार जताना नहीं। यही कारण था कि उन्होंने कश्यप को स्वतंत्र रूप से अपने पथ पर चलने दिया और केवल धर्म का मार्ग दिखाया।
मरीचि का आश्रम ज्ञान का तीर्थ था। वहाँ वेद ब्राह्मण आरण्यक और उपनिषदों की व्याख्या होती थी। वे शिष्यों को बताते थे कि ज्ञान संग्रह नहीं अनुभूति है। उन्होंने ज्योतिष काल गणना और ब्रह्मांडीय नियमों पर गहन चिंतन किया। कहा जाता है कि उन्होंने नक्षत्रों की गति को समझकर समय की पहली व्यवस्थित गणना प्रस्तुत की। उनके लिए आकाश केवल तारों का समूह नहीं ब्रह्म की चलती हुई लिपि था।
उनकी करुणा भी उतनी ही विशाल थी जितनी उनकी बुद्धि। कोई भी दुखी प्राणी उनके पास आता वे उसे धैर्य देते और उसके कर्म पथ को समझाते। वे शाप देने में विश्वास नहीं रखते थे वे चेतना बदलने में विश्वास रखते थे। उनका कहना था कि जब मन बदलता है तब भाग्य स्वयं बदल जाता है। इसीलिए उनके शिष्य केवल ज्ञानी नहीं विवेकी भी बनते थे।
मरीचि का जीवन शांति तप और ज्ञान का संगम था। उन्होंने कई राजाओं को दिशा दी कई ऋषियों को प्रेरणा दी और समाज को यह सिखाया कि धर्म बाहरी आडंबर नहीं आंतरिक अनुशासन है। वे स्वयं अत्यंत सरल जीवन जीते थे वन में कुटिया थोड़ा अन्न और शेष समय ध्यान में। पर उनकी चेतना इतनी विशाल थी कि उसमें पूरा ब्रह्मांड समा सकता था।
उनका अंतिम समय भी उतना ही शांत था जितना उनका जीवन। एक दिन वे अपने आश्रम में ध्यान में बैठे। श्वास धीमी होती गई मन गहरा होता गया और चेतना ब्रह्म में विलीन होने लगी। शिष्यों ने देखा कि उनके चारों ओर एक सौम्य प्रकाश फैल गया है। कुछ क्षणों बाद वह प्रकाश आकाश में विलीन हो गया और मरीचि की देह शांत हो गई। उन्होंने मृत्यु नहीं पाई वे प्रकाश में लौट गए उसी स्रोत में जहाँ से वे आए थे।
महर्षि मरीचि हमें यह सिखाते हैं कि सच्चा ऋषि वह है जो स्वयं प्रकाश बनकर दूसरों को मार्ग दिखाए। उनका जीवन एक किरण की तरह था शांत उज्ज्वल और सत्य की ओर ले जाने वाला।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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