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परिश्रम ही पूजा है: क्यों आपका 'कर्म' ही आपकी सबसे बड़ी 'साधना' है?

परिश्रम ही पूजा है: क्यों आपका 'कर्म' ही आपकी सबसे बड़ी 'साधना' है?

परिश्रम ही पूजा है

A close-up of two hands: one holding a sacred rudraksha and the other working a tool in a field, blending spirituality with labor

नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।

आज मैं उस सत्य को शब्द देने आया हूँ जिसे संसार अक्सर साधारण समझकर भूल जाता है, पर जो सनातन दृष्टि में अत्यंत पवित्र है परिश्रम ही पूजा है। यह वाक्य केवल नैतिक प्रेरणा नहीं, बल्कि जीवन का गहरा रहस्य है। जिस दिन मनुष्य अपने श्रम को पूजा समझकर करने लगे, उस दिन उसका जीवन बोझ नहीं रहता, वह साधना बन जाता है।

पूजा का अर्थ है किसी भी कार्य को पूर्ण मन, पूर्ण निष्ठा और पूर्ण ईमानदारी से करना। यदि मन बिखरा है, भाव अशुद्ध है और उद्देश्य स्वार्थ से भरा है, तो मंदिर में किया गया कर्म भी पूजा नहीं बनता। पर यदि मन समर्पित है, भाव शुद्ध है और उद्देश्य कल्याण से जुड़ा है, तो खेत में हल चलाना भी पूजा बन जाता है, सड़क साफ करना भी पूजा बन जाता है, बच्चों को पढ़ाना भी पूजा बन जाता है।

सनातन परंपरा ने कर्म को कभी तुच्छ नहीं माना। यहाँ कर्म को यज्ञ कहा गया। यज्ञ का अर्थ है स्वयं को किसी बड़े उद्देश्य के लिए समर्पित करना। जब मनुष्य ईमानदारी से अपना काम करता है, तब वह अपने समय, अपनी ऊर्जा और अपने कौशल को समाज के लिए अर्पित कर रहा होता है। यही यज्ञ है। यही पूजा है।

परिश्रम मनुष्य के अहंकार को तोड़ता है। जो परिश्रम करता है, वह धरती से जुड़ा रहता है। उसे पता होता है कि जीवन मेहनत से बनता है, छल से नहीं। और जो व्यक्ति परिश्रम को पूजा समझ लेता है, वह अपने काम में पवित्रता लाता है। वह न तो आलस्य से काम करता है, न ही छल से। उसका हर प्रयास उसके चरित्र को गढ़ता है।

परिश्रम से किया गया काम मन को शांत करता है। व्यर्थ बैठे मन में ही सबसे अधिक विकार उठते हैं ईर्ष्या भय असंतोष। जब मनुष्य अपने कार्य में पूरी तरह डूब जाता है, तब मन की गंदगी अपने आप बैठ जाती है। यही कारण है कि सच्चे कर्मयोगी भीतर से शांत होते हैं, भले ही बाहर उनका जीवन कितना ही व्यस्त क्यों न हो।

परिश्रम को पूजा मानने का अर्थ यह भी है कि हम अपने काम को बोझ नहीं, अवसर समझें। अवसर अपने भीतर की क्षमताओं को व्यक्त करने का, समाज में योगदान देने का, और अपने कर्तव्य को निभाने का। जब यह दृष्टि आती है, तब शिकायत मिटती है। तब मनुष्य यह नहीं पूछता कि मुझे क्या मिला, वह यह देखता है कि मैंने क्या दिया। यही दृष्टि जीवन को धन्य बना देती है।

सनातन धर्म ने कभी यह नहीं कहा कि केवल साधु ही पूज्य हैं। यहाँ गृहस्थ किसान कारीगर शिक्षक चिकित्सक सब पूज्य हैं, यदि वे अपने कर्म को ईमानदारी से करते हैं। क्योंकि ईश्वर को पाने के लिए संसार छोड़ना आवश्यक नहीं, संसार में सही ढंग से रहना आवश्यक है।

परिश्रम में ही अनुशासन है, और अनुशासन में ही आत्मविकास। जो व्यक्ति अपने काम से भागता है, वह अपने जीवन से भी भागता है। और जो अपने काम को स्वीकार कर लेता है, वह जीवन को स्वीकार कर लेता है। यही स्वीकार ही भक्ति की शुरुआत है।

जब मनुष्य अपना काम प्रेम से करता है, तब वह थकता नहीं, भले ही शरीर थक जाए। क्योंकि तब काम केवल आजीविका नहीं, आत्माभिव्यक्ति बन जाता है। यही स्थिति ध्यान के समान है। जहाँ मन और कर्म एक हो जाते हैं, वहीं योग होता है।

इसलिए स्मरण रहे मंदिर में सिर झुकाना पूजा हो सकता है, पर जीवन में कर्तव्य निभाना उससे भी बड़ी पूजा है।

परिश्रम ही पूजा है। जो इसे समझ लेता है, उसके लिए हर दिन पवित्र हो जाता है; और जो इसे जी लेता है, उसके लिए जीवन स्वयं एक अखंड आरती बन जाता है।

लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद


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