महर्षि पुलह की सम्पूर्ण कथा
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी। आज मैं तुम्हें उस महामहर्षि की कथा सुनाने आया हूँ जिनका नाम बहुत कम शोर करता है, पर जिनकी साधना से सृष्टि की स्थिरता पुष्ट होती है; जिनकी दृष्टि में वन, पशु, मानव और देव—सब एक ही ब्रह्म-धारा के रूप हैं; और जिनका जीवन यह सिखाता है कि करुणा और संयम से ही संसार टिकता है—आज मैं तुम्हें महर्षि पुलह की सम्पूर्ण कथा सुनाता हूँ, जन्म से लेकर देहावसान तक, एक ही प्रवाह में, बिना किसी उपशीर्षक के।
महर्षि पुलह ब्रह्मा की मानस-संतान परम्परा के उन ऋषियों में से थे जिनकी उत्पत्ति विचार से हुई और जिनका जीवन विचार को शांति में ढालने का अभ्यास था। जन्म के साथ ही उनके स्वभाव में स्थैर्य था—न आवेग, न उतावलापन—जैसे पर्वत की छाया। बाल्यकाल से ही वे प्रकृति के साथ संवाद करते थे; वृक्षों की श्वास, पशुओं की दृष्टि और वनों का मौन—सब उनके गुरु थे। वे वेदों का अध्ययन करते, पर उतना ही समय मौन में बिताते—क्योंकि वे जानते थे कि शब्द दिशा देते हैं, पर मौन सार तक पहुँचाता है।
पुलह का तप घने अरण्यों में फला-फूला। उनका आश्रम ऐसा था जहाँ हिंसा का प्रवेश नहीं था और भय का कारण नहीं था। वन्य पशु निर्भय होकर आते-जाते, पक्षी पास बैठते, और साधक मन के विकार छोड़कर शांति सीखते। पुलह कहते थे कि जो स्वयं को नियंत्रित कर ले, उसके लिए संसार अपने आप संतुलित हो जाता है। उनकी साधना शरीर को कष्ट देने की नहीं, मन को कोमल और दृढ़ बनाने की थी—कोमल करुणा में, दृढ़ अनुशासन में।
उनका गृहस्थ जीवन भी इसी संतुलन का उदाहरण था। उनकी पत्नी क्षमा और धैर्य की प्रतिमूर्ति थीं, और उनके वंश से ऐसे प्राणी उत्पन्न हुए जो प्रकृति के निकट, सरल और सहजीवी थे। पुराणों में कहा गया है कि पुलह के वंशजों में किम्पुरुष, किंनर और वन्य-जीवन से जुड़ी जातियाँ आईं—यह संकेत है कि पुलह का प्रभाव सभ्यता के शोर से दूर, प्रकृति के साथ सामंजस्य में जीने वालों पर अधिक था। वे किसी एक जाति या वर्ग के ऋषि नहीं थे; वे जीवन-शैली के ऋषि थे।
पुलह का आश्रम शिक्षा का केंद्र था, पर वहाँ प्रतियोगिता नहीं, सहयोग सिखाया जाता था। शिष्य तर्क करते थे, पर विजय के लिए नहीं; वे श्रवण करते थे, पर अंध-स्वीकार के लिए नहीं। पुलह उन्हें समझाते कि ज्ञान का पहला फल विनम्रता है—यदि वह न आए, तो समझो ज्ञान अधूरा है। वे आहार-विहार में सादगी रखते, ऋतुचर्या का पालन करते, और बताते कि प्रकृति के विरुद्ध चलना स्वयं के विरुद्ध चलना है। उनके लिए धर्म का अर्थ था—जीवन को बोझ नहीं, वरदान की तरह धारण करना।
राजा और प्रजा—दोनों पुलह के पास आते थे। राजा उनसे शासन का सूत्र पूछते, और वे उत्तर देते—कम नियम, अधिक उदाहरण। प्रजा उनसे जीवन का मार्ग पूछती, और वे कहते—कम चाह, अधिक कृतज्ञता। पुलह का प्रभाव भाषण से नहीं, उपस्थिति से पड़ता था। उनके पास बैठकर मनुष्य अपने भीतर की गति को धीमा होते देखता—और वही धीमापन विवेक बन जाता।
उनकी करुणा असीम थी, पर वह दुर्बल नहीं थी। वे अन्याय को अनदेखा नहीं करते थे, पर दंड को अंतिम उपाय मानते थे। पहले वे समझाते, फिर अवसर देते, और अंत में प्रकृति को निर्णय करने देते। उनका विश्वास था कि समय सत्य का सहयोगी है। इसी कारण उनके आश्रम में शांति स्थायी थी—क्योंकि वहाँ भय नहीं, भरोसा था।
अंतिम काल में पुलह और भी अंतर्मुखी हो गए। आश्रम चलता रहा, पर वे स्वयं मौन की गहराइयों में उतरते गए। एक संध्या वे वन-पथ पर ध्यानस्थ बैठे—श्वास स्थिर, मन निर्मल, और चेतना व्यापक। चंद्रमा की शीतल रोशनी में वन शांत था। शिष्यों ने देखा कि गुरु की देह स्थिर है, पर उपस्थिति व्यापक—जैसे शांति स्वयं आकार ले ले। धीरे-धीरे वह शांति प्रकाश में बदल गई—और पुलह देह-सीमा से परे ब्रह्म-चेतना में विलीन हो गए, बिना किसी घोषणा के, बिना किसी विदाई के—जैसे वन का मौन रात में घुल जाए।
महर्षि पुलह का संदेश आज भी उतना ही आवश्यक है—संतुलन शोर से नहीं, संयम से आता है; करुणा कमजोरी नहीं, स्थिर शक्ति है; और प्रकृति के साथ तालमेल ही स्थायी सभ्यता की कुंजी है।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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