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महर्षि पुलह: सृष्टि के 16 प्रजापतियों में से एक और ज्ञान-परंपरा के महान सेतु

महर्षि पुलह: सृष्टि के 16 प्रजापतियों में से एक और ज्ञान-परंपरा के महान सेतु

महर्षि पुलह ऋषि — सृष्टि संतुलन के मौन प्रजापति

A divine representation of Maharishi Pulaha establishing the Pulahaeshwar Lingam in Kashi, with the holy Ganges in the background.

महर्षि पुलह ऋषि का नाम उन सोलह प्रजापतियों में लिया जाता है जिनके बिना सृष्टि की कल्पना अधूरी है। ब्रह्मा ने जब जगत् की रचना के पश्चात उसके संतुलन और विस्तार की चिंता की, तब अपने चित्त से जिन दिव्य ऋषियों को उत्पन्न किया, पुलह उन्हीं मानस पुत्रों में से एक थे। उनका उद्देश्य केवल वंश-वृद्धि नहीं था, बल्कि जगत् को सुख, शान्ति और समृद्धि की ओर ले जाना था। यही कारण है कि ब्रह्मा ने उन्हें तप के साथ-साथ गृहस्थ धर्म का भी आदेश दिया, क्योंकि केवल वैराग्य से नहीं, संतुलित जीवन से ही सृष्टि टिकती है। पुलह ऋषि ने इस आदेश को अहंकार नहीं, सेवा समझकर स्वीकार किया और महर्षि कर्दम की पुत्रियों तथा दक्ष प्रजापति की पाँच कन्याओं से विवाह किया। उनसे उत्पन्न संतानें केवल मानव योनि तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि अनेक जातियों, प्राणियों और जीवन-रूपों में फैलीं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि पुलह ऋषि सृष्टि की विविधता के मूल स्त्रोतों में से एक थे।

पुलह ऋषि का जीवन केवल प्रजापति के रूप में सीमित नहीं था। उन्होंने ज्ञान-परंपरा को भी अत्यंत गंभीरता से साधा। उन्होंने सनंदन जैसे ब्रह्मचारी ऋषि को अपना गुरु स्वीकार किया और उनसे तत्वज्ञान की दीक्षा ली। यह वही सनातन परंपरा है जहाँ आयु या पद नहीं, बल्कि ज्ञान की श्रेष्ठता गुरु को निर्धारित करती है। पुलह ऋषि ने संप्रदाय की रक्षा का दायित्व लिया, आश्रम में रहते हुए आत्मतत्त्व का संपादन किया और अपने तप से वातावरण को शुद्ध किया। आगे चलकर यही पुलह ऋषि महर्षि गौतम के गुरु बने। उन्होंने गौतम को अपने ज्ञान का भंडार सौंप दिया, और गौतम ने उसी ज्ञान को आगे विस्तार दिया। इस प्रकार पुलह ऋषि केवल ज्ञान के साधक नहीं, ज्ञान के सेतु थे — जिन्होंने एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ब्रह्मविद्या को प्रवाहित किया।

पुराणों में उनका एक और स्वरूप प्रकट होता है — शिवभक्ति का। पुलह ऋषि भगवान शिव के परम भक्त थे। काशी में उन्होंने पुलहेश्वर नामक शिवलिंग की स्थापना की। काशी, जहाँ स्वयं शिव विश्वनाथ के रूप में विराजमान हैं, वहाँ किसी ऋषि द्वारा स्थापित लिंग का अर्थ केवल पूजा नहीं, बल्कि शिव-तत्त्व का साक्षात अनुभव है। कहा जाता है कि पुलह ऋषि की भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान शिव ने उन्हें अपना श्रीविग्रह दिखाया। यह दर्शन किसी चमत्कार के लिए नहीं था, बल्कि यह संकेत था कि जहाँ तप, भक्ति और करुणा एक साथ साधी जाती है, वहाँ ईश्वर को प्रकट होना ही पड़ता है।

पुलह ऋषि का वर्णन अनेक पुराणों और धर्मग्रंथों में मिलता है। वे निरंतर जप और तप में लीन रहते थे, पर उनका तप लोक-विमुख नहीं था। उनके तप से जगत् को तीनों स्तरों पर शान्ति मिली — आध्यात्मिक, जिससे आत्मा स्थिर हुई; आधिदैविक, जिससे प्रकृति संतुलित रही; और आधिभौतिक, जिससे समाज में सुख और समृद्धि बनी रही। ऐसे ऋषि सनातन परंपरा में इसलिए महान माने जाते हैं क्योंकि वे केवल स्वयं मुक्त नहीं हुए, बल्कि दूसरों के लिए भी मुक्ति का मार्ग बन गए।

पुलह ऋषि का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा तप संसार से भागना नहीं है, बल्कि संसार को सँभालना है। जब ज्ञान, भक्ति और कर्तव्य एक साथ चलते हैं, तभी सृष्टि सुरक्षित रहती है। यही पुलह ऋषि की मौन शिक्षा है, जो आज भी उतनी ही जीवित है जितनी उस युग में थी। 🕉️

लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद


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