सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

महर्षि पुलस्त्य: ब्रह्मा के मानस पुत्र से लेकर हिन्दू विधि-शास्त्र के प्रणेता तक का सफर

महर्षि पुलस्त्य: ब्रह्मा के मानस पुत्र से लेकर हिन्दू विधि-शास्त्र के प्रणेता तक का सफर

महर्षि पुलस्त्य की सनातन भूमिका और वंश परंपरा

An illustrative map of ancient India showing Narmada banks and the hermitage of Sage Pulastya, surrounded by ancient Smriti scrolls

महर्षि पुलस्त्य को हिन्दू धार्मिक परंपरा ब्रह्मा के उन दिव्य मानस पुत्रों में रखती है जो सृष्टि की योजना के मूल स्तंभ थे। ब्रह्मा ने जब अपने चित्त से सृष्टि के लिए चेतना को प्रकट किया, तब जिन ऋषियों का आविर्भाव हुआ, वे केवल शरीरधारी नहीं थे, वे ब्रह्मज्ञान के जीवित स्रोत थे। पुलस्त्य उन्हीं में से एक थे। वे न केवल तपस्वी थे बल्कि सृष्टि के नैतिक विधान के संरक्षक भी थे। कर्दम प्रजापति की पुत्री हविर्भुवा से उनका विवाह हुआ, जिससे वे दक्ष प्रजापति के दामाद बने और सती के पति शिव के साढू कहे गए। इस प्रकार पुलस्त्य का स्थान केवल ऋषि परंपरा में नहीं, बल्कि देव, प्रजापति और शिव परंपरा के बीच सेतु के रूप में भी स्थापित होता है।

जब दक्ष ने अपने यज्ञ में शिव का अपमान किया और सती ने उस अग्नि में देह त्याग किया, तब वह केवल एक पारिवारिक घटना नहीं थी, वह सृष्टि के संतुलन का टूटना था। उस यज्ञ-ध्वंस की अग्नि में केवल भवन और वेदियाँ नहीं जलीं, अनेक दिव्य अस्तित्व भी लीन हो गए। ग्रंथ बताते हैं कि उस समय पुलस्त्य भी उस योगाग्नि में नष्ट हुए। परन्तु ऋषि मृत्यु को अंत नहीं मानते। वैवस्वत मन्वंतर में ब्रह्मा के सभी मानस पुत्रों के साथ पुलस्त्य का पुनर्जन्म हुआ, जिससे यह सिद्ध होता है कि वे सृष्टि के चक्र से बँधे नहीं, बल्कि उसके नियंत्रक हैं।

पुलस्त्य का जीवन केवल वैराग्य नहीं था, उसमें तेज और मर्यादा दोनों थे। एक बार जब वे मेरु पर्वत पर गहन तप में लीन थे, तब स्वर्ग की अप्सराएँ उन्हें विचलित करने लगीं। तपस्वी के लिए यह केवल शारीरिक विघ्न नहीं होता, यह ब्रह्म-साधना पर आक्रमण होता है। पुलस्त्य ने क्रोध नहीं किया, पर उन्होंने ऋषि की मर्यादा से शाप दिया कि जो भी स्त्री उनके सामने आएगी, वह गर्भवती हो जाएगी। यह शाप नहीं, तप की शक्ति का परिणाम था। उसी शक्ति की लहर में वैशाली के राजा की कन्या इडविला असावधानी से उनके सामने आ गई और गर्भवती हो गई। तब पुलस्त्य ने उसे त्यागा नहीं, अपितु धर्म का पालन करते हुए उससे विवाह किया। उसी से विश्रवा का जन्म हुआ, और विश्रवा से आगे चलकर रावण उत्पन्न हुआ। इस प्रकार जिस रावण को संसार केवल अहंकार और विनाश के रूप में जानता है, उसकी जड़ में ब्रह्मा का मानस पुत्र पुलस्त्य ही था। यही सनातन की गूढ़ता है — अधर्म भी अंततः धर्म की ही वंशावली से निकलता है, और उसका विनाश भी उसी से होता है।

विश्रवा का निवास नर्मदा तट पर था, पश्चिम भारत में। इससे अनुमान होता है कि पुलस्त्य का आश्रम भी वहीं रहा होगा। नर्मदा केवल नदी नहीं, तपस्वियों की धमनियों में बहती चेतना है। जहाँ पुलस्त्य जैसे ऋषि रहे, वहाँ भूमि भी मंत्रमयी हो जाती है।

पुलस्त्य केवल कुलकर्ता या तपस्वी नहीं थे, वे धर्म के विधिवेत्ता भी थे। वृद्ध-याज्ञवल्क्य उन्हें धर्मवक्ता कहते हैं। उनके श्लोक शरीर-शुद्धि से लेकर आचरण की पवित्रता तक उद्धृत किए गए। मिताक्षरा जैसे विधि-ग्रंथों में उनके कथन मिलते हैं कि समाज के विभिन्न वर्णों के लिए श्राद्ध में भोजन का विधान अलग-अलग होना चाहिए — यह भेदभाव नहीं, अपितु प्रकृति के अनुरूप आचरण की व्यवस्था थी। अपरार्क जैसे ग्रंथों में सन्ध्या, अशौच, यति-धर्म और प्रायश्चित्त पर पुलस्त्य के अनेक वचन सुरक्षित हैं। स्मृतिचन्द्रिका और दानरत्नाकर जैसे आचार-ग्रंथों में भी उनके सिद्धांत उद्धृत होते हैं। इसका अर्थ यह है कि पुलस्त्य का प्रभाव केवल पुराणों तक सीमित नहीं था, वह हिन्दू विधि-संस्कृति की रीढ़ में समाया हुआ था।

‘पुलस्त्यस्मृति’ जिस काल में रची गई, वह भले ही 400 से 700 ईस्वी के बीच मानी जाती हो, पर उसके मूल सूत्र अत्यंत प्राचीन हैं। वे उस युग से आते हैं जब ऋषि समाज को केवल उपदेश नहीं देते थे, बल्कि जीवन जीने की शुद्ध विधि प्रदान करते थे।

इस प्रकार पुलस्त्य केवल रावण के पितामह या ब्रह्मा के पुत्र नहीं हैं, वे उस सनातन चेतना के प्रतिनिधि हैं जिसमें तप, धर्म, करुणा और न्याय एक साथ बहते हैं। उनके वंश से रावण जैसा अहंकार भी उत्पन्न हुआ और उसी वंश की स्मृति से राम जैसे धर्म के अवतार ने उसे नष्ट किया। यही सनातन की लीला है — जहाँ हर अंधकार की जड़ में भी कहीं न कहीं कोई ऋषि बैठा होता है, जो अंततः प्रकाश को जन्म देता है। 🕉️

लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद


🙏 Support Us / Donate Us

हम सनातन ज्ञान, धर्म–संस्कृति और आध्यात्मिकता को सरल भाषा में लोगों तक पहुँचाने का प्रयास कर रहे हैं। यदि आपको हमारा कार्य उपयोगी लगता है, तो कृपया सेवा हेतु सहयोग करें। आपका प्रत्येक योगदान हमें और बेहतर कंटेंट बनाने की शक्ति देता है।

Donate Now
UPI ID: ssdd@kotak



टिप्पणियाँ