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महर्षि पुलस्त्य की कथा: ब्रह्मा के मानसपुत्र, जिनका वंश रावण से लेकर वेदव्यास तक फैला है

महर्षि पुलस्त्य की कथा: ब्रह्मा के मानसपुत्र, जिनका वंश रावण से लेकर वेदव्यास तक फैला है

महर्षि पुलस्त्य की सम्पूर्ण और गहन कथा

Maharishi Pulastya meditating in the deep caves of the Himalayas, with a glowing halo representing his divine Brahmic power

नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी। आज मैं तुम्हें उस महर्षि की कथा सुनाने आया हूँ जिनकी तपस्या से हिमालय भी साक्षी बना, जिनकी वाणी से शास्त्रों की धारा बही, और जिनके वंश से ऐसे दिव्य ऋषि उत्पन्न हुए जिन्होंने वेद, पुराण और आयुर्वेद को समृद्ध किया—आज मैं तुम्हें महर्षि पुलस्त्य की सम्पूर्ण और गहन कथा सुनाता हूँ।

महर्षि पुलस्त्य ब्रह्मा के मानसपुत्र थे, अर्थात वे किसी गर्भ से नहीं, ब्रह्मा के संकल्प से उत्पन्न हुए थे। जन्म लेते ही उनमें ऐसा तेज था जो स्थिर और गंभीर था, जैसे पर्वतों की शांति। वे उन सप्तऋषियों में से थे जिनके कंधों पर सृष्टि के ज्ञान का भार था। बचपन से ही पुलस्त्य का मन बाहरी संसार में कम और भीतर के सत्य में अधिक रमा रहता था। वे लोगों की भीड़ में भी एकांत खोज लेते थे और एकांत में भी समस्त सृष्टि का अनुभव कर लेते थे।

पुलस्त्य का तप हिमालय की गुफाओं में हुआ। वर्षों तक वे एक ही स्थान पर बैठे ध्यान करते रहे। न भूख, न प्यास, न ठंड, न गर्मी—कुछ भी उनके संकल्प को डिगा नहीं सका। उनके भीतर ऐसी स्थिरता उत्पन्न हो गई थी कि विचार भी उनके मन में आकर शांत हो जाते थे। इसी तप से उन्होंने ब्रह्म, आत्मा और माया के रहस्यों को जाना। वे कहते थे कि जो दिखाई देता है वह अंतिम सत्य नहीं, और जो भीतर अनुभव होता है वही वास्तविक है।

महर्षि पुलस्त्य केवल ध्यानस्थ ऋषि नहीं थे, वे महान ज्ञान-रचनाकार भी थे। उन्हीं की परंपरा से महर्षि पराशर उत्पन्न हुए, जिन्होंने विष्णु पुराण की रचना की, और पराशर के पुत्र थे वेदव्यास, जिन्होंने महाभारत, भागवत पुराण और वेदों का विभाजन किया। इस प्रकार पुलस्त्य स्वयं उस ज्ञान-वंश की जड़ हैं जिससे सनातन धर्म का विशाल साहित्य फूटा। पर पुलस्त्य ने कभी इस पर गर्व नहीं किया। वे कहते थे कि ऋषि का धर्म संतान नहीं, शिष्य होते हैं।

उनका गृहस्थ जीवन भी तप के समान ही था। उनका विवाह हुआ हविर्भू से, जिनसे उनके पुत्र विश्रवा का जन्म हुआ। विश्रवा के दो महान पुत्र हुए—कुबेर और रावण। यह तथ्य अपने आप में पुलस्त्य की करुणा और संतुलन को दर्शाता है—एक ही वंश से देवता-समान कुबेर और अहंकार में डूबा रावण। पुलस्त्य दोनों को समान दृष्टि से देखते थे। वे कहते थे कि बीज एक है, पर वृक्ष अपने कर्म से बनता है। रावण के विषय में उन्होंने कई बार चेतावनी दी, पर अंततः कर्म का फल टल नहीं सका।

पुलस्त्य का आश्रम ज्ञान और मौन का केंद्र था। वहाँ वेदों, ब्राह्मणों और आरण्यकों की व्याख्या होती थी। वे शिष्यों को बताते थे कि शब्दों से परे जो मौन है, वही ब्रह्म का द्वार है। उनके लिए योग केवल आसन नहीं, चेतना की शुद्धि था। वे लोगों को भोग से नहीं, विवेक से मुक्त करते थे।

उनकी करुणा उतनी ही विशाल थी जितनी उनकी तपस्या। कोई भी दुखी उनके पास आता, वे उसे धैर्य देते। वे शाप देने से बचते थे, क्योंकि उनका विश्वास था कि शाप से नहीं, समझ से परिवर्तन आता है। इसी कारण वे देवताओं और मनुष्यों दोनों में सम्मानित थे।

महर्षि पुलस्त्य का अंतिम समय शांत था। एक दिन वे ध्यान में बैठे और अपनी चेतना को भीतर की गहराई में उतार दिया। श्वास धीमी हो गई, देह स्थिर हो गई और मन पूर्णतः शुद्ध हो गया। शिष्यों ने देखा कि उनके चारों ओर एक सौम्य प्रकाश फैल रहा है। कुछ ही क्षणों में वह प्रकाश आकाश में विलीन हो गया और पुलस्त्य देह से परे ब्रह्म में लीन हो गए। वे मृत्यु को प्राप्त नहीं हुए—वे अपने ही मूल में लौट गए।

महर्षि पुलस्त्य का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा ज्ञान शोर में नहीं, मौन में मिलता है; और सच्ची महानता प्रचार में नहीं, साधना में। उनका नाम आज भी उस मौन की तरह है जो सब कुछ कह देता है।

लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद


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