नचिकेता — मृत्यु से भी निर्भीक प्रश्न करने वाला बालक
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं तुम्हें एक ऐसी कथा सुनाने आया हूँ जो न युद्ध की है, न वरदानों की लालसा की, बल्कि सत्य को जानने की अग्नि की है—यह कथा है नचिकेता की, उस बालक की जिसने मृत्यु के देवता से भी निर्भीक होकर आत्मा का रहस्य पूछा। यह वही प्रसंग है जहाँ प्रश्न करने का साहस, संसार की हर उपलब्धि से बड़ा सिद्ध होता है।
बहुत प्राचीन समय में उद्दालक ऋषि के पुत्र नचिकेता अपने पिता के यज्ञ में बैठे थे। यज्ञ में दान का विधान चल रहा था, पर नचिकेता ने देखा कि दान में दी जा रही गायें वृद्ध और दुर्बल हैं। बालक का मन विचलित हुआ। उसने विनम्रता से पिता से पूछा कि ऐसे दान से यज्ञ का फल कैसे सिद्ध होगा। प्रश्न सुनकर पिता क्रोधित हो गए और आवेश में बोल उठे—“मैं तुम्हें यम को देता हूँ।” पिता के शब्द वज्र की तरह गिरे, पर नचिकेता के मन में भय नहीं जगा। उसने पिता के वचन को सत्य मानकर मृत्यु के लोक की ओर प्रस्थान किया, क्योंकि उसके लिए वचन की मर्यादा जीवन से भी बड़ी थी।
यमलोक पहुँचकर नचिकेता ने देखा कि यमराज बाहर हैं। बालक तीन दिन तीन रात बिना भोजन के प्रतीक्षा करता रहा। जब यम लौटे, तो उन्हें ज्ञात हुआ कि एक अतिथि भूखा रह गया है। धर्म के रक्षक यम लज्जित हुए और बोले—“हे ब्राह्मण बालक, तुमने तीन रात्रियाँ प्रतीक्षा कीं, अतः मैं तुम्हें तीन वर देता हूँ।”
पहले वर में नचिकेता ने पिता के क्रोध की शांति और गृह-समाधान माँगा। दूसरे वर में उसने उस अग्नि-विद्या को माँगा जिससे स्वर्ग का मार्ग जाना जाता है। यम ने प्रसन्न होकर दोनों वर दे दिए। तीसरे वर के समय बालक ने कहा—“जब मनुष्य मरता है, तब क्या रहता है? आत्मा है या नहीं? इसी का उत्तर दीजिए।” यह सुनकर यम ने बालक की परीक्षा ली। उन्होंने स्वर्ग, दीर्घायु, धन, राज्य, संगीत और भोगों का प्रलोभन दिया, पर नचिकेता अडिग रहा। उसने कहा—“ये सब क्षणिक हैं। जो सत्य शाश्वत है, वही बताइए।”
यम मुस्कराए। उन्होंने देखा कि यह बालक भोग से नहीं, बोध से संचालित है। तब यम ने आत्मा का रहस्य प्रकट किया—कि आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है; वह अग्नि से नहीं जलती, जल से नहीं भीगती; वह इंद्रियों से परे और बुद्धि से भी सूक्ष्म है। जो उसे जान लेता है, वही भय से मुक्त होता है। यम ने यह भी बताया कि ज्ञान का मार्ग कठिन है, पर वही मुक्तिदायी है; जबकि भोग का मार्ग सरल है, पर बंधनकारी है।
नचिकेता ने उस उपदेश को हृदय में धारण किया और अमर बोध के साथ लौटा। यह कथा सिखाती है कि यदि सत्य की जिज्ञासा निष्कपट हो, तो मृत्यु भी गुरु बन जाती है। नचिकेता ने जो पाया, वह किसी वरदान से बड़ा था—स्वयं को जानने का प्रकाश। यही प्रकाश जीवन के हर भय को हर लेता है।
स्रोत / संदर्भ: यह कथा कठोपनिषद (कृष्ण यजुर्वेद) में नचिकेता–यम संवाद के रूप में वर्णित है।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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