पूजा केवल विधि नहीं, भावना है
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं उस सत्य को स्मरण कराने आया हूँ जिसे समझे बिना पूजा केवल क्रिया बनकर रह जाती है, और समझ लेने पर वही पूजा जीवन को पवित्र कर देती है — पूजा केवल विधि नहीं, भावना है। यदि पूजा केवल विधि होती, तो मंत्रों की शुद्धता से ही ईश्वर प्रसन्न हो जाते; यदि पूजा केवल नियम होती, तो समय, दिशा और सामग्री से ही भक्ति पूर्ण हो जाती। पर ईश्वर न शब्दों से बँधते हैं, न वस्तुओं से — वे तो भावना के स्पर्श से प्रकट होते हैं।
विधि बाहर की व्यवस्था है, भावना भीतर की अवस्था। विधि हाथों से होती है, भावना हृदय से। विधि सीखी जा सकती है, भावना जगाई जाती है। कोई व्यक्ति शास्त्रों की पूरी पूजा-विधि न जानता हो, पर यदि उसके भीतर श्रद्धा, कृतज्ञता और समर्पण है, तो उसकी साधारण-सी प्रार्थना भी ईश्वर तक पहुँच जाती है। और कोई व्यक्ति पूरी विधि के साथ पूजा करे, पर भीतर अहंकार, दिखावा या जल्दबाज़ी हो, तो उसकी पूजा शब्दों और धुएँ से आगे नहीं बढ़ पाती।
पूजा का अर्थ है — जुड़ना। जुड़ना उस सत्ता से जो हमसे बड़ी है, जो हमें चलाती है, जो हमें थामे हुए है। यह जुड़ाव भावना से होता है, गणना से नहीं। माँ अपने बच्चे के लिए कोई विधि नहीं जानती, पर उसका प्रेम ही उसकी सबसे बड़ी पूजा है। उसी प्रकार भक्त का प्रेम, उसकी विनम्रता, उसकी कृतज्ञता ही उसकी पूजा की आत्मा है।
जब पूजा केवल विधि बन जाती है, तब वह बोझ बन जाती है। मन समय देखता है, सामग्री गिनता है, सही-गलत में उलझता है। पर जब पूजा भावना बन जाती है, तब वह सहज हो जाती है। तब ईश्वर को बुलाने की आवश्यकता नहीं रहती — वे स्वयं उपस्थित हो जाते हैं। तब दीप जलाना भी पूजा है और किसी दुखी का हाथ थाम लेना भी। तब मंदिर में बैठना भी पूजा है और घर में ईमानदारी से काम करना भी।
भावना के बिना विधि खोखली होती है। जैसे बिना जल के बीज अंकुरित नहीं होता, वैसे ही बिना भावना के पूजा फल नहीं देती। भावना पूजा को जीवित बनाती है। वही भावना आँखों में नमी लाती है, मन में शांति लाती है, और जीवन में विनम्रता लाती है।
ईश्वर को यह नहीं देखना होता कि पूजा कितनी लंबी थी, उन्हें यह देखना होता है कि हृदय कितना सच्चा था। उन्हें यह नहीं देखना होता कि कितने मंत्र बोले गए, उन्हें यह देखना होता है कि कितनी करुणा जागी। जब पूजा के बाद मन पहले से अधिक शांत, अधिक संवेदनशील और अधिक ईमानदार हो जाए — तभी समझना चाहिए कि पूजा हुई है।
भावना से की गई पूजा जीवन को बदल देती है। वह अहंकार को ढीला करती है, अपेक्षाओं को हल्का करती है, और मनुष्य को भीतर से नम्र बनाती है। ऐसी पूजा के बाद मनुष्य दूसरों से कठोर नहीं होता, बल्कि और कोमल हो जाता है। क्योंकि जिसने ईश्वर को हृदय से छुआ है, वह किसी और के हृदय को दुखा नहीं सकता।
पूजा का वास्तविक फल चमत्कार नहीं, चरित्र है। यदि पूजा के बाद भी क्रोध वैसा ही रहे, लालच वैसा ही रहे, द्वेष वैसा ही रहे — तो समझ लेना चाहिए कि विधि तो हुई, पर भावना नहीं जगी। और यदि बिना किसी विशेष विधि के भी मन अधिक शांत, अधिक सजग और अधिक करुणामय हो जाए — तो समझ लेना चाहिए कि पूजा सफल हो गई।
इसलिए सनातन दृष्टि ने पूजा को बाँधा नहीं, खोला है। उसने कहा — जहाँ श्रद्धा है, वहीं मंदिर है। जहाँ कृतज्ञता है, वहीं आरती है। जहाँ सेवा है, वहीं यज्ञ है। जहाँ प्रेम है, वहीं ईश्वर है।
अंततः पूजा कोई कर्मकांड नहीं, एक संबंध है — आत्मा और परमात्मा के बीच। और हर सच्चा संबंध भावना से ही जीवित रहता है।
इसीलिए स्मरण रहे —
पूजा केवल विधि नहीं, भावना है।
विधि से पूजा होती है,
भावना से ईश्वर मिलते हैं।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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