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राजा हरिश्चंद्र की कथा: सत्य के लिए राज्य, पत्नी और पुत्र का त्याग करने वाले प्रतापी राजा

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राजा हरिश्चंद्र की कथा — सत्य की अंतिम परीक्षा

King Harishchandra in the cremation ground of Kashi, performing his duty with truth and integrity

नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।

आज मैं तुम्हें उस राजा की कथा सुनाने आया हूँ जिसके लिए सत्य राज्य से बड़ा था, परिवार से बड़ा था, और स्वयं जीवन से भी बड़ा था। यह कथा है राजा हरिश्चंद्र की। यह कथा बताती है कि जब सत्य को अंतिम सीमा तक पकड़ा जाता है, तब स्वयं ईश्वर भी साक्षी बनकर सामने आते हैं।

अयोध्या के प्रतापी राजा हरिश्चंद्र अपने सत्यव्रत, दानशीलता और न्यायप्रियता के लिए प्रसिद्ध थे। वे कभी असत्य नहीं बोलते थे और जो वचन दे देते, उसे किसी भी मूल्य पर निभाते थे। उनके इस गुण की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। उसी समय ऋषि विश्वामित्र ने निश्चय किया कि सत्य की इस दृढ़ता की परीक्षा ली जाए, क्योंकि तप और ज्ञान के साथ-साथ सत्य की कसौटी भी आवश्यक होती है।

एक दिन विश्वामित्र राजा के पास पहुँचे और दान माँगा—सम्पूर्ण राज्य। हरिश्चंद्र ने बिना क्षण भर सोचे दान स्वीकार कर लिया। राज्य दान कर देने के बाद भी दान-पूर्ति शेष थी, क्योंकि ऋषि ने दक्षिणा माँगी। राजा ने समय माँगा और अपनी रानी तारा और पुत्र रोहिताश्व सहित नगर छोड़ दिया। दक्षिणा चुकाने के लिए उन्होंने अपनी पत्नी और पुत्र तक को बेच दिया, पर अपने वचन से पीछे नहीं हटे।

दक्षिणा पूरी होने पर भी विपत्ति समाप्त नहीं हुई। राजा काशी पहुँचे और श्मशान में चाण्डाल के यहाँ सेवक बन गए, जहाँ उनका कार्य मृतकों से कर वसूलना था। जो कभी राजा था, वही अब श्मशान का सेवक था। इसी श्मशान में एक दिन उनकी पत्नी तारा अपने मृत पुत्र रोहिताश्व का शव लेकर पहुँचीं। निर्धनता के कारण वे कर नहीं दे सकीं। हरिश्चंद्र ने पहचानते हुए भी सत्य और नियम के कारण कर माँगा।

तारा कर चुकाने के लिए अपने वस्त्र तक उतारने लगीं। राजा का हृदय टूट गया, पर उन्होंने सत्य का साथ नहीं छोड़ा। उसी क्षण आकाश से पुष्पवर्षा हुई। देवता प्रकट हुए, विश्वामित्र का कठोर रूप करुणा में बदल गया, और देवताओं ने घोषणा की कि परीक्षा पूर्ण हुई। रोहिताश्व जीवित हो उठे, तारा का दुःख समाप्त हुआ, और हरिश्चंद्र को दिव्य लोक का वरदान मिला।

राजा हरिश्चंद्र ने कहा कि वे अकेले नहीं, अपनी प्रजा सहित स्वर्ग जाना चाहते हैं, क्योंकि उनके लिए धर्म सदा समष्टि का था।

यह कथा सिखाती है कि सत्य कोई सुविधा नहीं, बल्कि साधना है। वह तब तक सत्य नहीं, जब तक वह कठिन न हो। हरिश्चंद्र ने दिखाया कि सत्य की रक्षा में यदि सब कुछ भी चला जाए, तो अंततः वही सत्य सब कुछ लौटा देता है—सम्मान, जीवन और प्रकाश।

स्रोत / संदर्भ
यह कथा मार्कण्डेय पुराण तथा महाभारत के वनपर्व में हरिश्चंद्र–उपाख्यान के रूप में वर्णित है।

लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद


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