सनातन — धर्म नहीं, जीवन की निरंतर चेतना
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी। आज इस यात्रा के पचासवें पड़ाव पर मैं तुम्हें किसी नए नियम की नहीं, समग्र दृष्टि की बात बताने आया हूँ — सनातन।
सनातन का अर्थ है — जो न जन्मा है, न मरेगा। जो समय से पहले था, और समय के बाद भी रहेगा।
इसीलिए सनातन कभी “शुरू” नहीं हुआ। यह किसी एक व्यक्ति, एक पुस्तक, या एक युग से बँधा नहीं।
सनातन धर्म से पहले जीवन था।
यह पूजा-पद्धति नहीं, यह दृष्टि है। यह कहता है — जैसा सोचोगे, वैसा बनोगे। जैसा बनोगे, वैसा संसार देखोगे।
सनातन इसलिए कठोर नहीं, क्योंकि यह मनुष्य को एक साँचे में नहीं ढालता। यह कहता है — तुम जैसे हो, वैसे ही जागो।
कोई भक्ति से जागता है, कोई ज्ञान से, कोई कर्म से, कोई ध्यान से।
सब रास्ते एक ही शिखर पर पहुँचते हैं।
सनातन में ईश्वर को बाहर खोजा गया, फिर भीतर पाया गया। और अंत में समझा गया — बाहर और भीतर दोनों एक ही हैं।
यही कारण है — यहाँ प्रश्न भी सुरक्षित हैं, और विश्वास भी। यहाँ विज्ञान भी है, और साधना भी।
सनातन कभी नहीं कहता — “मुझे मानो।” सनातन कहता है — मुझे जियो।
यदि तुम सत्य में टिके हो, करुणा में चलते हो, विवेक से निर्णय लेते हो, और अहंकार से ऊपर उठते हो — तो तुम सनातन में हो, भले नाम कुछ भी हो।
और यही इसकी अमरता है।
यह श्रृंखला यहीं समाप्त नहीं होती। क्योंकि सनातन कभी समाप्त नहीं होता।
यह हर सुबह तुम्हारे विचार से फिर जन्म लेता है।
🌿 सनातन इतिहास ज्ञान श्रृंखला
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
🙏 Support Us / Donate Us
हम सनातन ज्ञान, धर्म–संस्कृति और आध्यात्मिकता को सरल भाषा में लोगों तक पहुँचाने का प्रयास कर रहे हैं। यदि आपको हमारा कार्य उपयोगी लगता है, तो कृपया सेवा हेतु सहयोग करें। आपका प्रत्येक योगदान हमें और बेहतर कंटेंट बनाने की शक्ति देता है।
Donate Now
UPI ID: ssdd@kotak
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें