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सावित्री–सत्यवान — जब धर्म ने मृत्यु को पराजित किया

सावित्री–सत्यवान — जब धर्म ने मृत्यु को पराजित किया

सावित्री और सत्यवान — धर्म से पराजित हुई मृत्यु

Maa Savitri following Yama with wisdom and dharma to save Satyavan

नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।

आज मैं तुम्हें एक ऐसी कथा सुनाने आया हूँ जिसमें न युद्ध है, न कोई अस्त्र, न देवताओं की सभा—पर फिर भी यह कथा मृत्यु तक को पराजित कर देती है। यह कथा है सावित्री और सत्यवान की, जहाँ एक नारी की बुद्धि, धैर्य और धर्म ने स्वयं मृत्यु के देवता को भी विवश कर दिया।

बहुत प्राचीन समय की बात है। मद्र देश के राजा अश्वपति के कोई संतान नहीं थी। वर्षों तक उन्होंने तप, व्रत और साधना की। अंततः उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवी सावित्री प्रकट हुईं और वर दिया कि उनके घर एक तेजस्वी कन्या जन्म लेगी। समय आने पर एक अद्भुत कन्या का जन्म हुआ—तेजस्वी, बुद्धिमती और धर्मनिष्ठ। उसी देवी के नाम पर उसका नाम सावित्री रखा गया। जैसे-जैसे वह बड़ी हुई, उसका सौंदर्य, विवेक और आत्मबल चारों ओर प्रसिद्ध होने लगा।

जब विवाह का समय आया तो राजा ने सावित्री से स्वयं वर चुनने को कहा। सावित्री वन-प्रदेशों में गईं और वहीं उन्होंने एक तपस्वी युवक को देखा—नाम था सत्यवान। वह अंधे राजा द्युमत्सेन का पुत्र था, जो अपना राज्य खोकर वन में रहते थे। सावित्री ने सत्यवान को ही अपना पति चुन लिया।

राजसभा में यह सुनकर सब चकित हो गए, क्योंकि नारद मुनि ने चेताया कि सत्यवान के जीवन की आयु केवल एक वर्ष शेष है। राजा अश्वपति ने सावित्री को समझाया, पर सावित्री अडिग रहीं—“एक बार जिसे पति मान लिया, उससे हटना अधर्म है।” और इस प्रकार उनका विवाह सत्यवान से हो गया।

सावित्री ने विवाह के बाद राजवैभव छोड़कर वन का जीवन अपनाया। सेवा, संयम और धर्म—यही उनका जीवन बन गया। जैसे-जैसे वह वर्ष पूरा होने आया, सावित्री का तप और अधिक गहन होता गया।

जिस दिन सत्यवान की मृत्यु निश्चित थी, उस दिन सावित्री ने उपवास रखा और सत्यवान के साथ वन में गईं। सत्यवान लकड़ी काटते समय मूर्छित होकर गिर पड़े। तभी वहाँ यमराज प्रकट हुए और सत्यवान के प्राण लेकर चल पड़े।

सावित्री ने यमराज का अनुगमन किया। यम ने कहा—“देवि, यहाँ से लौट जाओ।” पर सावित्री शांत स्वर में धर्म, सत्य और पत्नी-धर्म की बातें करने लगीं। यम उनके विवेक से प्रसन्न हुए और वर देने लगे—एक-एक करके।

सावित्री ने पहले ससुर के राज्य की वापसी माँगी, फिर सौ पुत्रों का वर माँगा। यमराज ने सब दे दिया। तब सावित्री ने विनम्रता से कहा—“अब यदि मुझे सौ पुत्र चाहिए, तो मेरा पति जीवित होना आवश्यक है।”

यमराज क्षणभर मौन रहे, फिर मुस्कराए—धर्म ने मृत्यु को परास्त कर दिया था। उन्होंने सत्यवान के प्राण लौटा दिए।

सत्यवान जीवित हो उठे। वन में फिर से प्रकाश फैल गया। द्युमत्सेन को राज्य मिला, और सावित्री-सत्यवान का जीवन धर्म और प्रेम का आदर्श बन गया।

यह कथा हमें सिखाती है कि नारी का बल केवल भावुकता नहीं, बल्कि विवेक, धर्म और सत्यनिष्ठा में है। जहाँ प्रेम धर्म से जुड़ जाता है, वहाँ मृत्यु भी हार मान लेती है।

स्रोत / संदर्भ: यह कथा महाभारत के वनपर्व में वर्णित सावित्री–सत्यवान उपाख्यान से ली गई है, जिसका उल्लेख बाद के पुराणों में भी इसी भाव के साथ मिलता है।

लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद


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