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महर्षि भारद्वाज — जब ज्ञान सेवा बना और विज्ञान धर्म

महर्षि भारद्वाज — जब ज्ञान सेवा बना और विज्ञान धर्म

महर्षि भारद्वाज — ज्ञान, विज्ञान और लोकहित का अखंड ऋषि-मार्ग

Maharshi Bharadwaj teaching Vedic science and Ayurveda in ancient ashram

नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।

आज मैं तुम्हें उस महर्षि की कथा सुनाने आया हूँ जिनका नाम सुनते ही वेद, विज्ञान, आयुर्वेद, धनुर्विद्या और राष्ट्र-निर्माण—सब एक साथ स्मरण हो आते हैं; जिनके आश्रम से निकले शिष्य महाभारत की दिशा बदल देते हैं; और जिनकी साधना ने यह सिद्ध किया कि ज्ञान केवल ग्रंथों में नहीं, बल्कि प्रयोग, करुणा और लोकहित में साकार होता है—आज मैं तुम्हें महर्षि भारद्वाज की सम्पूर्ण कथा सुनाता हूँ, जन्म से लेकर देहावसान तक, एक ही प्रवाह में, बिना किसी उपशीर्षक के।

महर्षि भारद्वाज का जन्म वैदिक युग की उस पवित्र धारा में हुआ जहाँ तप, सत्य और प्रयोग एक-दूसरे से अलग नहीं थे। कहा जाता है कि वे महर्षि बृहस्पति के वंश से सम्बद्ध थे और बाल्यकाल से ही उनकी बुद्धि असाधारण, दृष्टि सूक्ष्म और जिज्ञासा प्रखर थी। वे प्रश्न पूछते थे—देह क्यों थकती है, प्राण कैसे चलता है, आकाश में ध्वनि कैसे गूँजती है, और युद्ध में अस्त्र क्यों विजय दिलाते हैं—और इन प्रश्नों के उत्तर वे केवल सुनकर नहीं, साधना और प्रयोग से खोजते थे। किशोरावस्था में ही उन्होंने वेदों का गहन अध्ययन कर लिया और शीघ्र ही समझ लिया कि वेदों का उद्देश्य केवल स्तुति नहीं, बल्कि लोक-कल्याण है। इसी भाव से उन्होंने तप का मार्ग चुना—कठोर, निरंतर और निस्वार्थ।

उनकी तपस्या का केन्द्र प्रयाग के वन-प्रांत में स्थित वह आश्रम था जहाँ गंगा-यमुना की धाराएँ मिलती हैं और जहाँ ज्ञान स्वयं जल की तरह बहता है। भारद्वाज का आश्रम गुरुकुल था—परंपरागत अर्थ में नहीं, बल्कि एक जीवित प्रयोगशाला की तरह—जहाँ आयुर्वेद, धनुर्वेद, व्याकरण, ज्योतिष, विमान-विद्या, औषधि-विज्ञान और नीति—सब एक साथ पढ़ाए जाते थे। वे शिष्यों से कहते थे कि जो ज्ञान रोगी को स्वस्थ न करे, सैनिक को विवेक न दे, और राजा को धर्म न सिखाए—वह अधूरा है। इसी दृष्टि से उन्होंने आयुर्वेद को केवल चिकित्सा नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति के रूप में गढ़ा—आहार, विहार, ऋतुचर्या, मानसिक संतुलन और नैतिक अनुशासन—सबको एक सूत्र में बाँधा।

भारद्वाज का जीवन केवल शांति का नहीं, संघर्ष का भी साक्षी है। लोककथाएँ बताती हैं कि एक समय उनके तप से देवताओं तक को चिंता हुई—क्योंकि उनका ज्ञान केवल आध्यात्मिक नहीं, तकनीकी भी था। कहा जाता है कि उन्होंने आकाश-यान और ध्वनि-विज्ञान पर विचार किया, और युद्ध में नैतिकता को सर्वोपरि रखने का आग्रह किया। यही कारण था कि उनके आश्रम से निकलने वाले शिष्य केवल वीर नहीं, धर्मवीर बनते थे। उनके शिष्यों में सबसे प्रसिद्ध नाम द्रोणाचार्य का है—जिनका जन्म स्वयं एक विलक्षण प्रसंग से जुड़ा है—पर भारद्वाज ने पुत्र को केवल शस्त्र नहीं सिखाए, उन्होंने उसे यह भी सिखाया कि गुरु का दायित्व सत्ता नहीं, शिष्य की चेतना है। यही संस्कार आगे चलकर कुरुक्षेत्र के भीषण युद्ध में दृष्टिगोचर होते हैं—जहाँ विद्या के साथ विवेक की परीक्षा होती है।

भारद्वाज की करुणा उतनी ही गहरी थी जितना उनका ज्ञान। वे रोगियों को देखकर पहले उनका मन पढ़ते, फिर नाड़ी। वे कहते थे कि भय, लोभ और क्रोध—ये तीन रोगों के द्वार हैं; और शांति, संयम व सत्य—तीन औषधियाँ। उनके आश्रम में आने वाले राजा भी भूमि पर बैठते थे, क्योंकि वहाँ सिंहासन नहीं, शास्त्र बोलते थे। रामायण-काल में भी उनका आश्रम एक प्रमुख केन्द्र रहा—जहाँ वनवासियों को अन्न, शिक्षा और संरक्षण मिलता था; और जहाँ से धर्म का मार्ग प्रशस्त होता था। भारद्वाज का नाम सुनते ही वन्य पशु भी शांत हो जाते—क्योंकि उनकी साधना में अहिंसा केवल सिद्धांत नहीं, अनुभूति थी।

उनकी साधना दीर्घ थी, पर अहंकार शून्य। वे स्वयं को कर्ता नहीं, माध्यम मानते थे। कहते हैं कि जब किसी शिष्य ने उनसे पूछा—“गुरुदेव, आपका सबसे बड़ा ज्ञान क्या है?”—तो उन्होंने उत्तर दिया—“जो जानकर भी न जताया जाए।” यही भाव उनके जीवन का सूत्र था। अंतिम काल में वे अधिक मौनप्रिय हो गए। आश्रम की गतिविधियाँ चलती रहीं, पर वे स्वयं ध्यान में स्थिर होते गए—जैसे नदी धीरे-धीरे समुद्र की ओर बढ़ती है। एक प्रभात ऐसा आया जब शिष्यों ने उन्हें ध्यानासन में देखा—देह स्थिर, श्वास सूक्ष्म, और वातावरण में एक अद्भुत शांति। फिर जैसे ही सूर्य की किरणें वन में उतरीं, वह शांति और गहरी हो गई—और भारद्वाज देह-सीमा से परे ब्रह्म-चेतना में विलीन हो गए। न शोक, न शोर—केवल सुगंध, मौन और कृतज्ञता।

महर्षि भारद्वाज का जीवन यह सिखाता है कि सच्चा ऋषि वह है जो ज्ञान को सत्ता नहीं, सेवा बनाए; जो प्रयोग को अहंकार नहीं, लोकहित का साधन बनाए; और जो शिष्य को केवल विजयी नहीं, विवेकी बनाए। उनका संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है—जब विज्ञान और नैतिकता साथ चलें, तभी सभ्यता स्थिर रहती है।

लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद


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