युवा हिन्दू को मूर्ख क्यों समझा गया? — एक पीढ़ी के साथ हुआ मौन प्रयोग
🔥 युवा हिन्दू को मूर्ख क्यों समझा गया? 🔥
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज का यह लेख न सॉफ्ट है, न सुरक्षित, न संतुलित। यह लेख सीधा और असहज है — क्योंकि सच हमेशा असहज होता है।
पिछले कुछ दशकों में युवा हिन्दू को एक खास तरीके से तैयार किया गया। उसे बताया गया — “तुम बहुत भोले हो।” “तुम बहुत सहनशील हो।” “तुम सबको समझ लेते हो।”
असल मतलब समझो। भोले = जिसे आसानी से दबाया जा सके। सहनशील = जो अन्याय पर भी चुप रहे। समझदार = जो अपना नुकसान भी ‘मैनेज’ कर ले।
यही कारण है कि हिन्दू युवा को सबसे पहले उसके धर्म से काटा गया।
उसे सिखाया गया — धर्म पुराना है। धर्म पिछड़ा है। धर्म बोलने की चीज़ नहीं।
लेकिन सवाल यह है — अगर धर्म इतना ही बेकार था, तो दुनिया की हर बड़ी विचारधारा किसी न किसी “धर्म-सरीखी” संरचना पर क्यों खड़ी है?
सनातन धर्म तुम्हें भीड़ नहीं बनाता। वह तुम्हें व्यक्ति बनाता है। और सिस्टम को व्यक्ति नहीं चाहिए — उसे भीड़ चाहिए।
इसलिए हिन्दू को सिखाया गया कि वह शर्मिंदा रहे। अपने देवी-देवताओं को “symbol” समझे। अपनी परंपराओं को “ritual” कहकर टाल दे।
अगर हिन्दू मूर्ख होता, तो वह हजारों साल तलवार, शासन और अत्याचार सहकर भी अपना अस्तित्व कैसे बचा लेता?
अगर हिन्दू कमजोर होता, तो भगवद्गीता युद्धभूमि में खड़े होकर कर्तव्य और विवेक की बात कैसे करती?
सच यह है — हिन्दू कभी मूर्ख नहीं था। उसे मूर्ख समझा गया।
क्योंकि जो प्रश्न करता है, जो तर्क करता है, जो भीतर से जुड़ा होता है — वह किसी एजेंडे में फिट नहीं बैठता।
आज का युवा हिन्दू गुस्से में है। और यह गुस्सा गलत नहीं है। गलत यह है कि इस गुस्से को दिशा नहीं दी गई।
या तो उसे “कट्टर” बना दिया गया, या फिर “कूल बनकर चुप” रहने को कहा गया।
सनातन तीसरा रास्ता देता है — जाग्रत विवेक।
न नफरत। न डर। बस स्पष्टता।
याद रखो — जो तुम्हें अपनी जड़ों से काटता है, वह तुम्हें कभी आज़ाद नहीं करना चाहता।
और जो तुम्हें अपनी पहचान पर शर्मिंदा करता है, वह पहले ही तुम्हें हरा चुका होता है।
यह लेख हंगामा करने के लिए नहीं है। यह लेख आँखें खोलने के लिए है।
अगर इसे पढ़कर तुम्हें लगा कि “हाँ, मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ” — तो समझो यह सिर्फ तुम्हारी कहानी नहीं, पूरी पीढ़ी की कहानी है।
🕉️ मैं हिन्दू हूँ। और अब मूर्ख बनने वाला नहीं।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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