सनातन धर्म में प्रश्न पूछने की परंपरा
सनातन धर्म की आत्मा यदि किसी एक गुण में सबसे स्पष्ट रूप से प्रकट होती है, तो वह है प्रश्न करने का साहस। यहाँ धर्म कभी भी आँख मूँदकर मान लेने की परंपरा नहीं रहा। सनातन परंपरा में प्रश्न को विद्रोह नहीं, साधना माना गया है। ऋषियों ने स्पष्ट कहा कि जो प्रश्न नहीं करता, वह खोज नहीं करता; और जो खोज नहीं करता, वह सत्य तक नहीं पहुँच सकता। इसीलिए सनातन धर्म में प्रश्न पूछना अश्रद्धा नहीं, बल्कि श्रद्धा की परिपक्व अवस्था समझी गई।
वेदों और उपनिषदों की रचना ही प्रश्नों से हुई है। उपनिषदों का स्वरूप देखिए—कोई उपदेशात्मक ग्रंथ नहीं, बल्कि संवाद हैं। एक जिज्ञासु शिष्य और एक अनुभवी गुरु के बीच चलती हुई बातचीत। शिष्य पूछता है—यह संसार क्या है? मृत्यु के बाद क्या है? आत्मा क्या है? सत्य क्या है? गुरु तुरंत उत्तर नहीं देता; वह पहले शिष्य की पात्रता देखता है, उसके प्रश्न की गहराई परखता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि सनातन परंपरा में प्रश्न केवल शब्द नहीं होते, वे भीतर की प्यास का प्रमाण होते हैं।
कठोपनिषद में नचिकेता का प्रश्न इसका अत्यंत सुंदर उदाहरण है। मृत्यु के देवता यमराज के सामने खड़ा एक बालक पूछता है—“मृत्यु के बाद आत्मा रहती है या नहीं?” यह प्रश्न केवल जिज्ञासा नहीं, जीवन और मृत्यु के भय से उपजा सत्य का अन्वेषण है। यमराज पहले उसे धन, दीर्घायु और सुख का प्रलोभन देते हैं, पर नचिकेता प्रश्न से पीछे नहीं हटता। यही सनातन परंपरा है—जहाँ प्रश्न इतना मूल्यवान है कि उसके लिए स्वर्ग भी ठुकराया जा सकता है।
महाभारत में भी प्रश्न की यही परंपरा दिखाई देती है। युद्धभूमि में खड़े होकर अर्जुन का प्रश्न केवल व्यक्तिगत मोह नहीं है, वह मानवता का प्रश्न है—“मैं क्या करूँ?” उसी प्रश्न से भगवान कृष्ण द्वारा गीता का उपदेश प्रकट होता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि कृष्ण अर्जुन को चुप रहने को नहीं कहते। वे उसे यह नहीं कहते कि “यह धर्म है, मान लो।” वे पूरे विस्तार से समझाते हैं, तर्क देते हैं, दृष्टांत रखते हैं—और अंत में कहते हैं: “यथेच्छसि तथा कुरु”—अब तुम स्वयं निर्णय करो। यही सनातन धर्म की विशेषता है—प्रश्न पूछो, समझो, और फिर स्वतंत्र होकर निर्णय लो।
सनातन परंपरा में प्रश्न इसलिए आवश्यक माने गए, क्योंकि यहाँ सत्य को स्थिर नहीं, अनुभवजन्य माना गया। सत्य कोई सूचना नहीं थी, जिसे रट लिया जाए; सत्य वह था, जिसे स्वयं जाना जाए। और जानने की प्रक्रिया प्रश्न से ही शुरू होती है। जो व्यक्ति प्रश्न नहीं करता, वह परंपरा को जीवित नहीं रखता—वह केवल उसका अनुकरण करता है। ऋषियों को अनुयायी नहीं चाहिए थे; उन्हें अन्वेषक चाहिए थे।
गुरुकुल व्यवस्था में भी प्रश्न पूछना अनिवार्य था। शिष्य केवल सुनने वाला पात्र नहीं था, वह संवाद का सहभागी था। गुरु यह नहीं मानता था कि उसका कहा अंतिम सत्य है। वह शिष्य को सोचने के लिए प्रेरित करता था। यदि शिष्य मौन रह जाए और प्रश्न न करे, तो गुरु मानता था कि ज्ञान भीतर नहीं उतरा। इसलिए कहा गया—श्रवण, मनन और निदिध्यासन। श्रवण बिना मनन के अधूरा है, और मनन बिना प्रश्न के असंभव है।
सनातन धर्म में प्रश्न पूछने की परंपरा का एक और गहरा अर्थ है—अहंकार का त्याग। प्रश्न वही करता है, जो यह स्वीकार करता है कि वह नहीं जानता। यह स्वीकार ही आध्यात्मिक यात्रा की पहली सीढ़ी है। जो स्वयं को पूर्ण मान ले, उसके लिए प्रश्न समाप्त हो जाते हैं—और उसी क्षण उसका विकास भी रुक जाता है। इसलिए शास्त्रों में अज्ञान को दोष नहीं माना गया, पर प्रश्न न करना एक बड़ी बाधा माना गया।
यह भी महत्वपूर्ण है कि सनातन परंपरा हर प्रकार के प्रश्न को स्वीकार नहीं करती। यहाँ प्रश्न का स्तर भी महत्वपूर्ण है। तर्क के लिए तर्क करना, बहस के लिए प्रश्न उठाना—इसे शास्त्र “कुतर्क” कहते हैं। सच्चा प्रश्न वह है, जो समाधान चाहता है, विजय नहीं। जो प्रश्न अहंकार से आता है, वह भ्रम बढ़ाता है; जो प्रश्न जिज्ञासा से आता है, वह बोध की ओर ले जाता है। इसीलिए गुरु पहले शिष्य के भाव को देखता है, फिर उत्तर देता है।
आज के युग में, जहाँ प्रश्न पूछना अक्सर विद्रोह या नकारात्मकता समझ लिया जाता है, सनातन धर्म की यह परंपरा और भी प्रासंगिक हो जाती है। यहाँ प्रश्न व्यवस्था को तोड़ने के लिए नहीं, सुधारने के लिए पूछे जाते हैं। यहाँ प्रश्न आस्था को नष्ट नहीं करते, बल्कि उसे परिपक्व बनाते हैं। अंधी आस्था अस्थिर होती है; प्रश्नों से गुज़री आस्था दृढ़ होती है।
सनातन संस्कृति यह भी सिखाती है कि हर प्रश्न का उत्तर शब्दों में नहीं मिलता। कई बार गुरु मौन रहता है—और वही मौन उत्तर होता है। यह मौन शिष्य को भीतर देखने के लिए बाध्य करता है। क्योंकि अंतिम सत्य बाहर नहीं, भीतर प्रकट होता है। प्रश्न बाहर से शुरू होता है, पर उत्तर भीतर समाप्त होता है।
अंततः, सनातन धर्म में प्रश्न पूछने की परंपरा मनुष्य को स्वतंत्र, जिम्मेदार और जाग्रत बनाती है। यह परंपरा कहती है—मत मानो, जानो; मत दोहराओ, समझो; मत झुको, खोजो। यही कारण है कि सनातन धर्म हज़ारों वर्षों तक जीवित रहा—क्योंकि वह प्रश्नों से डरता नहीं, वह प्रश्नों से जीवित रहता है। सनातन धर्म का यही संदेश है— जहाँ प्रश्न जीवित हैं, वहीं ज्ञान जीवित है। और जहाँ प्रश्न मर जाते हैं, वहाँ धर्म भी धीरे-धीरे जड़ हो जाता है।
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