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सनातन धर्म में ज्ञान बनाम सूचना का अंतर

सनातन धर्म में ज्ञान बनाम सूचना का अंतर

सनातन धर्म में ज्ञान बनाम सूचना का अंतर

Knowledge vs Information Sanatan

आज का युग सूचना का युग है। एक स्पर्श में हजारों तथ्य, लाखों विचार और अनगिनत मत हमारे सामने उपस्थित हो जाते हैं। मनुष्य पहले से अधिक पढ़ रहा है, अधिक देख रहा है, अधिक सुन रहा है—परंतु क्या वह उतना ही अधिक समझ भी रहा है? यही वह प्रश्न है जहाँ सनातन धर्म “ज्ञान” और “सूचना” के बीच का गहरा अंतर स्पष्ट करता है। क्योंकि सनातन दृष्टि में सूचना (Information) और ज्ञान (Wisdom) समानार्थी नहीं हैं। सूचना मन में जमा होती है; ज्ञान चेतना को बदल देता है।

सूचना वह है जो बाहर से आती है—पुस्तकों से, इंटरनेट से, संवाद से। वह तथ्य देती है, आंकड़े देती है, विवरण देती है। पर ज्ञान वह है जो भीतर से प्रकट होता है। सूचना स्मृति में रहती है; ज्ञान स्वभाव में उतरता है। सूचना से व्यक्ति बोल सकता है; ज्ञान से व्यक्ति बदल सकता है। यही कारण है कि सनातन परंपरा ने केवल पढ़ने को शिक्षा नहीं माना—उसने अनुभव, साधना और आत्मबोध को शिक्षा का केंद्र बनाया।

उपनिषदों में बार-बार यह वाक्य आता है—“विद्या और अविद्या दोनों को जानो।” यहाँ अविद्या का अर्थ केवल अज्ञान नहीं, बल्कि बाहरी ज्ञान—वह जो संसार चलाने के लिए आवश्यक है। पर विद्या वह है जो आत्मा का बोध कराए। यही अंतर सूचना और ज्ञान के बीच है। सूचना संसार में सफल बना सकती है; ज्ञान जीवन को सार्थक बनाता है। सूचना से सुविधा मिलती है; ज्ञान से दिशा मिलती है।

सनातन धर्म में ऋषि-मुनि केवल शास्त्रों के ज्ञाता नहीं थे, वे अनुभव के साधक थे। उन्होंने सत्य को केवल पढ़ा नहीं, जिया। इसी कारण उनका ज्ञान कालातीत हुआ। यदि ज्ञान केवल शब्दों का खेल होता, तो वेद-उपनिषद समय के साथ अप्रासंगिक हो जाते। परंतु वे आज भी जीवित हैं, क्योंकि वे सूचना नहीं, अनुभूति से उपजे हैं। जब कोई ऋषि कहता है—“अहं ब्रह्मास्मि”—तो वह कोई सूचना नहीं दे रहा; वह एक अनुभव की घोषणा कर रहा है।

सूचना का एक स्वभाव है—वह अहंकार को बढ़ा सकती है। जितनी अधिक जानकारी, उतना अधिक “मुझे पता है” का भाव। पर ज्ञान का स्वभाव उल्टा है—जितना गहरा ज्ञान, उतनी अधिक विनम्रता। इसीलिए कहा गया—विद्या ददाति विनयम्। सच्चा ज्ञानी कभी स्वयं को सर्वज्ञ नहीं मानता। क्योंकि ज्ञान उसे यह दिखा देता है कि सत्य अनंत है और वह स्वयं सीमित है। सूचना सीमाओं को छुपाती है; ज्ञान उन्हें स्वीकार करता है।

आज के समय में व्यक्ति घंटों स्क्रीन पर बिताता है। समाचार, लेख, वीडियो—सब कुछ लगातार मन में प्रवेश कर रहा है। यह सूचना का प्रवाह है। पर यदि यह प्रवाह भीतर स्थिरता, करुणा, धैर्य या विवेक नहीं बढ़ा रहा, तो वह ज्ञान नहीं बना। सनातन धर्म कहता है कि ज्ञान वही है जो रूपांतरण करे। यदि क्रोध कम नहीं हुआ, यदि लोभ घटा नहीं, यदि दृष्टि व्यापक नहीं हुई—तो समझो अभी सूचना ही है, ज्ञान नहीं।

गुरु–शिष्य परंपरा भी इसी अंतर को स्पष्ट करती है। गुरु शिष्य को केवल तथ्य नहीं देता। वह उसे जीवन की जटिलताओं में सत्य को पहचानना सिखाता है। यही कारण है कि भगवान कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध की रणनीति नहीं, दृष्टि दी। अर्जुन के पास पहले से सूचना थी—धर्म, अधर्म, संबंध, कर्तव्य—सब पता था। परंतु वह भ्रमित था। कृष्ण ने उसे ज्ञान दिया—दृष्टि दी। सूचना ने उसे रोका; ज्ञान ने उसे स्थिर किया।

सनातन दृष्टि में ज्ञान का एक और लक्षण है—समग्रता। सूचना अक्सर खंडित होती है। वह एक पक्ष दिखाती है, दूसरा छुपा लेती है। ज्ञान दोनों पक्षों को जोड़ता है। सूचना से बहस होती है; ज्ञान से संवाद होता है। सूचना से तर्क बढ़ता है; ज्ञान से समझ बढ़ती है। यही कारण है कि शास्त्रों ने श्रवण (सुनना), मनन (चिंतन) और निदिध्यासन (अंतर में उतारना) की प्रक्रिया बताई। केवल श्रवण सूचना है; मनन और निदिध्यासन उसे ज्ञान बनाते हैं।

ज्ञान का संबंध नैतिकता से भी है। सूचना आपको बता सकती है कि क्या लाभदायक है; ज्ञान आपको बताता है कि क्या उचित है। सूचना कहती है—“यह रास्ता तेज़ है।” ज्ञान पूछता है—“क्या यह रास्ता सही भी है?” सूचना आपको सफल बना सकती है; ज्ञान आपको संतुलित बनाता है। यही कारण है कि सनातन परंपरा में गुरु को केवल शिक्षक नहीं, मार्गदर्शक कहा गया।

सूचना की सीमा है—वह समय के साथ बदल जाती है। विज्ञान के तथ्य अद्यतन होते रहते हैं, समाज के नियम बदलते रहते हैं। पर ज्ञान के मूल सिद्धांत नहीं बदलते। सत्य, करुणा, संयम, धैर्य—ये मूल्य युगों से समान हैं। यही ज्ञान है—जो समय से परे है। सूचना काल-सापेक्ष है; ज्ञान कालातीत।

सनातन धर्म यह भी सिखाता है कि सूचना आवश्यक है, पर पर्याप्त नहीं। संसार चलाने के लिए सूचना चाहिए—व्यवसाय, विज्ञान, तकनीक, समाज—सब सूचना पर आधारित हैं। पर जीवन को अर्थ देने के लिए ज्ञान चाहिए। यदि सूचना अधिक और ज्ञान कम हो जाए, तो समाज चतुर तो हो जाता है, पर शांत नहीं। सुविधा तो बढ़ती है, पर संतोष घटता है।

अंततः, सनातन धर्म का संदेश स्पष्ट है—सूचना एक साधन है, ज्ञान साध्य। सूचना बाहर से आती है; ज्ञान भीतर से जागता है। सूचना मन को भरती है; ज्ञान मन को मुक्त करता है। सूचना आपको दूसरों से आगे कर सकती है; ज्ञान आपको स्वयं से ऊपर उठा सकता है। आज जब दुनिया सूचना से भर चुकी है, तब सनातन की यह शिक्षा और भी प्रासंगिक हो जाती है—कि पढ़ना पर्याप्त नहीं, समझना आवश्यक है। जानना पर्याप्त नहीं, जीना आवश्यक है। और सुन लेना पर्याप्त नहीं, उसे अपने भीतर उतार लेना ही सच्चा ज्ञान है। यही है ज्ञान और सूचना के बीच का सनातन अंतर— जहाँ सूचना बाहर की रोशनी है, और ज्ञान भीतर का सूर्य।

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