महाभारत की एक सर्वाधिक सच्ची और कठोर कथा — भीष्म की शरशय्या
महाभारत की एक सर्वाधिक सच्ची और कठोर कथा है — भीष्म की शरशय्या। यह कथा न युद्ध की विजय की है, न पराजय की, यह कथा है धर्म के बोझ की, जिसे जीवन भर ढोया गया और अंत में काँटों पर लेटकर चुकाया गया।
भीष्म कोई साधारण योद्धा नहीं थे। वे प्रतिज्ञा थे। उन्होंने जीवन को नहीं जिया, जीवन को बाँध लिया था। पिता के सुख के लिए उन्होंने अपना विवाह, वंश, सुख और भविष्य — सब त्याग दिया। उसी क्षण से वे “देवव्रत” नहीं रहे, वे “भीष्म” बन गए — भयंकर नहीं, बल्कि अडिग। पर महाभारत हमें यह भी सिखाती है कि प्रतिज्ञा यदि विवेक से ऊपर हो जाए, तो वही धर्म का बोझ बन जाती है।
कुरुक्षेत्र के युद्ध में भीष्म जानते थे कि अधर्म किस ओर है। वे यह भी जानते थे कि सत्य किसके साथ खड़ा है। फिर भी वे हस्तिनापुर की ओर से युद्ध कर रहे थे, क्योंकि उन्होंने सिंहासन से नहीं, प्रतिज्ञा से निष्ठा बाँध रखी थी। यही महाभारत की सबसे पीड़ादायक सच्चाई है — कई बार मनुष्य अधर्म इसलिए करता है क्योंकि वह पहले किसी वचन में बँध चुका होता है।
जब अर्जुन के बाणों ने भीष्म को शरशय्या पर लिटा दिया, तब भी वे मरे नहीं। उन्हें मृत्यु का अधिकार था, पर उन्होंने उसे भी रोक रखा था। वे धरती और आकाश के बीच लटके रहे — क्योंकि धर्म का हिसाब अभी बाकी था। उस शरशय्या पर लेटा व्यक्ति योद्धा नहीं था, वह साक्षी था — अपने ही निर्णयों का।
वहीं, बाणों की उस शय्या पर, पांडव उनके पास आए। वही पांडव जिनके पक्ष में सत्य था, पर जिनके विरुद्ध भीष्म ने अस्त्र उठाया था। भीष्म ने उन्हें न आशीर्वाद दिया, न क्षमा माँगी — उन्होंने उन्हें राजधर्म, आपद्धर्म और मोक्षधर्म का ज्ञान दिया। यह वही क्षण है जब महाभारत कहती है — ज्ञान अक्सर जीवन के अंत में आता है, जब उसे जीने का समय समाप्त हो चुका होता है।
और सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि भीष्म को कष्ट युद्ध से नहीं हुआ, कष्ट इस बात का था कि वे जानते थे, फिर भी बदल नहीं सके। उन्होंने द्रौपदी के अपमान पर मौन रखा। उन्होंने अधर्म को देखा, पहचाना, पर रोका नहीं। यही कारण है कि महाभारत में भीष्म पूजनीय हैं, पर आदर्श नहीं। वे महान हैं, पर पूर्ण नहीं।
जब उत्तरायण आया, तब भीष्म ने देह त्यागी। मृत्यु उनके लिए मुक्ति थी, क्योंकि जीवन उनके लिए ऋण बन चुका था। श्रीकृष्ण स्वयं उनके सामने खड़े थे — जैसे यह बताने के लिए कि धर्म व्यक्ति से नहीं, विवेक से बड़ा होता है।
महाभारत की यह कथा हमें यह नहीं सिखाती कि प्रतिज्ञा करो, यह सिखाती है कि प्रतिज्ञा से बड़ा भी कभी-कभी धर्म होता है।
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